गतांक से आगे

डूब जाते हैं कई जहां तक इन आंसुओं में
कि ये मेरे आँसू सिर्फ पानी नहीं हैं 
सुनो प्रिय न जाने क्यों मेरी आँख में आँसू आ जाते हैं ....न जाने क्यों ये बहते हैं और बहते चले जाते हैं ....ना जाने क्यों कितनी अनगिनत बातें करते हैं और करते ही चले जाते हैं ,,,,कितना समझाते हैं ...कितना बहलाते हैं पर ये तो नासमझ से बहते ही चले जाते हैं ....सुनो प्रिय ये तेरी यादों के आँसू मेरी आँखों से बहकर तुम्हें पल पल में कर्जदार बना रहे हैं ...प्रिय मैं तुम्हें अपना कर्जदार नहीं बनाना चाहती फिर भी झरने से बहते हुए ये अश्क गहरी झील सी बनते जा रहे हैं ...माना कि ये जशन है आंसुओं का पर फिर भी कितने नादां हैं आँसू ....खता बस इतनी सी कि चाहा तुम्हें ....दिल की हर तह में बसाया तुम्हें ....याद आती हैं तुम्हारी चाहत की बातें ...रस्में, वादे, कसमें ,,,क्या था वो सब कुछ? क्या वो प्यार था या ये यह प्यार है ...उफ़्फ़ ....
रात्रि के अंतिम प्रहर में छिटपुट चमकते हुए तारे गवाह हैं हमारे छलक्ते हुए प्रेम के ...क्या ये तारे भी हमारे साथ हमारे दुख में शामिल हैं ? क्या ये भी हमें अपना सहारा दे रहे हैं ? अभी पूरी धरती पर सन्नाटा सा है    ,,कुछ देर में चिड़ियों के चहचहाते स्वर उभरेंगे ...सूर्य की किरणों से जहां रोशन हो जाएगा.. तो क्या ओस में भीगी हुई घास हमें अहसास दिलायेगी कि वे तारे भी रोये थे रात में साथ हमारे ... 

हे ईश्वर ये कैसी परीक्षाएँ हैं ? ये कैसे दर्द हैं ? ये कैसी तकलीफ़ें हैं ? ये कैसे दुख हैं ? 
जब हम सही हैं तब गलत क्या है ? क्या है गलत ? 
नहीं पता है मुझे ...हाँ नहीं पता कि अब इंतिहान और कितने हैं ??
तुम जो समझो... तुम जो सोचो 
हम अपनी बात कहेंगे ,,,,,,
कहीं देर न का दो तुम इतनी ज्यादा कि घर यह बह जाये .....क्रमशः 
सीमा असीम
             
                      

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