दूर तक खामोशियों के संग बहा जाए
बैठकर तनहाई में खुद को सुना जाये
देर तक सोचते हुए आया मुझे ख्याल
आइनों के सामने खुद पर भी हंसा जाये
जिस्म के पिजरे का पंक्षी सोचता रहता है ये
आसमा में पंख फैला कर भी उड़ा जाये
उम्र भर के इस सफर में बार बार चाहा तो था
अनकहा जो रह गया वो भी कहा जाये
खुद की खुशबू में सिमट कर उम्र सारी काट ली
कुछ दिनों तो दूर खुद से भी रहा जाये !!
बैठकर तनहाई में खुद को सुना जाये देर तक सोचते हुए आया मुझे ख्याल
आइनों के सामने खुद पर भी हंसा जाये
जिस्म के पिजरे का पंक्षी सोचता रहता है ये
आसमा में पंख फैला कर भी उड़ा जाये
उम्र भर के इस सफर में बार बार चाहा तो था
अनकहा जो रह गया वो भी कहा जाये
खुद की खुशबू में सिमट कर उम्र सारी काट ली
कुछ दिनों तो दूर खुद से भी रहा जाये !!
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