ये शब्द भर नहीं हैं प्रिय 

ये मेरे हृदय का अंकन हैं 

ये प्रेम भर नहीं है प्रिय 

ये तेरे माथे का चन्दन है

 

अब जी चाहता है
उड़ चलें आसमां में,
कहीं दूर बहुत दूर 
उन पंक्षियों की तरह 
न कोई बंदिश 
न कोई बंधन 
न कोई डर
न कोई भय
उस नीले गगन पर
बादलों के समंदर पर
तोड़ कर सब सरहदें 
तोड़ कर सब हदें 
हो जाएँ बेहद, बेहिसाब
कि मन बहुत उदास है 
आँखों में नमी है 
औ दिल में अजब सी प्यास है
इन अपनों के बीच 
कैसी बेगानी सी हूँ 
इस जमीन पर 
चलते चलते थक गयी हूँ
जहां भटकन भरी राहें हैं
फूल और कांटे  हैं,
कहीं रुक न जाये कदम 
कहीं ठिठक न जाये कदम
कि अब मैं जाऊं किधर 
क्यों होता जा रहा वैराग है
मैं तो सिर्फ खुशी ही देना चाहती हूँ 
हमेशा और सदा 
फिर क्यों निराश हूँ
क्यों धड़कनों में बेचैनी है 
हमने तो एक जहाँ बसाया था
प्रेम से सजाया था
अब दुआ रब से यही 
उसे यूं ही बनाए रखना 
अपनेपन से निखारे रखना 
मेरे प्यार को निभाए रखना 
उस जहां से बस खुशियाँ ही खुशियाँ हो 
न हो कोई गम 
न दुख दर्द 
नफरत का नामोंनिशां न हो
बस यही इल्तिजा है 
मेरे प्रेम को सदा 
गलत नजरों से बचाए रखना
मेरे प्रेम की इज्ज़त बनाए रखना !!
सीमा असीम

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