गतांक से आगे 
तेरा मेरा साथ रहे !
तेरा मेरा साथ रहे !! 
रिया मुस्करा 
      सुनो प्रिय 
यह कैसी कशिश है ॥यह कैसा जादू है ॥ यह कौन सा रहस्य है कि मैं तुमसे 
जरा सी भी दूरी बनाती हूँ उतनी ही और ज्यादा तुम्हारी तरफ खींची चली आती 
हूँ, सनम सच तो यह है कि तुमसे एक पल की दूरी ख्वाब में भी बर्दास्त नहीं
है तो बताओ मैं कैसे तुमसे पल भर को अलग हो सकती हूँ !
 मुझे लगता है कि अब मुझे दुनियाँ की कोई भी ताकत तुमसे जुदा नहीं
कर सकती है हाँ प्रिय यह सच है ..चाहे तुम्हें इस बात का ख्याल रहे या 
न रहे ...

सुनो सनम अब मुझे कितना भी दर्द हो, या कितनी भी खुशियाँ हो लेकिन 
बस तुम्हारा हाथ मेरे हाथ को कसकर पकड़े रहे ...बिना कोई कसम या वादे
के और बिना किसी हक के तुम यूं ही हमेशा मेरे साथ चलते रहो ...
प्रिय इस प्रातःकालीन मुहूर्त में मेरा लिखा एक एक शब्द अक्षरशः सच हो जाये
मेरे प्रिय तुम्हें मेरे सच्चे प्यार का अहसास हो जाये ...जैसे मैं पल पल में  
तुम्हें अपने ख़यालों में रखती हूँ ठीक वैसे ही तुम भी मुझसे एक पल को भी 
अपने ख्यालों से दूरी न कर पाओ .... न हो पाओ पल भर को भी दूर ...
इस जहां की कोई भी दीवार, कोई भी रिश्ता, दुनियाँ, समाज या कोई भी हमें 
तुमसे दूर न कर पाये और तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए बेपनाह बेइंतिहा 
विश्वास का, प्रेम का, प्यार का जज़्बा जाग जाये  .....
प्रिय क्या तुम्हें पता है मेरी साँसे हरदम महकती रहती है इनसे हमेशा तुम्हारी
ही खुशबू आती रहती है ...मेरी आँखों में तुम्हारी छवि दिखाई देती रहती है 
और मेरी जुबान पर पल पल तुम्हारा ही नाम रहता है ..
 
 यह आज से नहीं है उस दिन से है जब तुमने मुझे पहली बार छूआ था 
मेरे लब पर अपने लब रखे थे ॥मेरे बालों से खेलते हुए मेरे गाल को पहली 
बार चूमा था और गले में डाल कर गलबहियाँ मुझे अपना बना लिया था बस 
तब से मैं तो सिर्फ तुम्हारी ही होकर रह गयी हूँ ॥
सिर्फ तुम्हारे ही ख़यालों में खोई हुई इस दुनियाँ से बेजार हो गयी हूँ ...
अब न तो मुझे किसी का न डर है, न भय है ...न कोई परवाह है 
...चाहे तुम मुझे कोई सजा दो, दुख दो,दर्द  दो मैं सब कुछ बहुत आसानी 
से सह लेती हूँ क्योंकि मैं अपने सच्चे दिल से सिर्फ तुम्हें अपना मानती हूँ 
तुम्हें ही चाहती हूँ ...प्रिय मैं लाख कोशिश करूँ लेकिन न तो मैं तुमसे कभी
नाराज हो पाती हूँ और न ही तुम्हें जरा सी भी तकलीफ दे पाती हूँ मैं तो
सारे दर्द अकेले सहकर भी तुम्हें सिर्फ और सिर्फ खुशी देना चाहती हूँ ...
मेरे प्रिय मेरा प्रेम जुनून हर हद पार कर चुका है और कोई भी हद मुझे
 तुमसे भला कैसे दूर कर पाएगी ..... क्योंकि तुम तो मेरी नस नस में 
खून की तरह बहते हो... प्रिय तुम्हें मैं बरसों से अपनी कोख में पालती आई
हूँ क्या तुम्हें पता है कि मैं खुद के लिए नहीं तुम्हारे लिए ही जीती हूँ !
मैं बस इतना चाहती हूँ कि मैं अपने प्रेम के वो सारे हक अदा कर जाऊँगी 
जो दुनियाँ में आज तक न तो किसी ने सोचे होंगे॥ न ही बनाए होंगे ...
मैं तो मर कर भी तुम्हें निभा लूँगी प्रिय हाँ मैं निभा लूँगी॥ हर हल में 
बिना किसी शिकायत के ....क्योंकि सच को किसी से भी डर नहीं लगता 
बस तुम्हारी खुशी के लिए मैं अपनी उस ल्क्ष्मन रेखा को जो तुमने मेरे लिए 
खींच दी है उसे भी यूं ही निभाउंगी और तब तक निभाउंगी जब तक तुम 
कहोगे या चाहोगे ॥
 
प्रिय तुम बिल्कुल बेफिक्र रहो मैं तो अपनी जान देकर भी तुम्हें निभा लूँगी,, 
हाँ निभा लूँगी  ...क्रमशः 
सीमा असीम  

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