गतांक से आगे 
रिया मुस्करा
आ बैठ मेरे पास तुझे देखती रहूँ 
न तू कुछ कहे न मैं कुछ कहे 
हाँ प्रिय बस ऐसे ही मेरे सामने बैठे रहो बिना कुछ बोले बिना कुछ सुने,,, यूं ही बिना पलके झपकाए तुम्हें देखती रहूँ, न कोई सवाल, न कोई जवाब ,,,बस न कोई शिकवा, न कोई शिकायत, न यह बताऊँ कि कैसे बिताए दिन या कैसे रही इतने दिन तुम्हारे बिन ? कब कब आए तुम ख्वाबों में ? किस रात सोई और कौन सी रात यूं ही गुजर गयी आँखों में ,,,
अपने लबों को सी कर देखती रहूँ तुम्हारी आँखों में और बसा कर एक बार उतार लूँ इस तरह से दिल में कि तुम भटक ही नहीं पाओ ,,जमाने की कोई तकलीफ से तुम्हारा सामना ही न हो ,,,,मेरे प्रियतम मैं अपनी पलकें झपका लूँ ,,,समा जाऊँ तुम्हारी बाहों के घेरे में और घेर लूँ तुम्हें अपनी बाहों में ,,,,न जीतने की परवाह हो, न हारने की, न रीत जाने की ,,,और बस इसी तरह अपने एक एक शब्द में तुम्हें रचती रहूँ ,,,और जलाये रहूँ अपने मन का दीपक, दुनियाँ की, जमाने की आंधियों की परवाह किए बगैर ,,,,
क्या तुम्हें पता है ? तुम जानते हो कि प्रिय के साथ होने का अहसास भर ही चेहरे की
चमक और आँखों की रोशनी बढ़ा देता है और साथ होने पर चेहरे को कमल की तरह खिला देता है ....
मेरे दिल की आवाज लफ्जों की मोहताज नहीं रही 
खामोशियों में धड़कते दिल की धड़कन में सुन लेना !!
क्रमशः 
सीमा असीम

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद