गतांक से आगे
सुनो प्रिय
मैं जब तुम्हें लिखने बैठती हूँ चाँद उतर आता है कागज पर ...मैं तुम्हें आवाज लगाती हूँ और तुम आ जाते हो, ठहर जाते हो , और बतियाने लगते हो ॥फिर भी मैं न जाने क्यों तुमसे कभी कभी बहुत नाराज होती हूँ लेकिन कह नहीं पाती ...कुछ नहीं कह पाती ... क्या तुम मेरी नाराजगी कभी समझ पाते हो, कभी भाप पाते हो कि क्यों और किसलिए हूँ मैं तुमसे नाराज ....नहीं जानते न? कैसे समझ पाओगे तुम ?
फिर मैं खुद ही खुद को समझा देती हूँ कि शायद मेरी ही गलती हो .... या मेरे ही प्यार में कमी हो ,,मेरी श्र्धा में कमी है ,, मेरी आस्था में कमी है ,,मेरे विश्वास में कमी है ,,बहला लेती हूँ अपने मन को इसी तरह .....और तुम पर अपनी नाराजगी कभी ज़ाहिर ही नहीं होने देती .....एक दिन जब कभी तुम मिलोगे तो मैं तुमसे सारी शिकायत कर लूँगी ....प्रिय हम कब मिलेंगे ? हम कब साथ होंगे ? तुम क्यों नहीं आ जाते ।हमेशा हमेशा के लिए ...क्यों जाते हो पल भर को भी तुम ? क्यों आखिर क्यों ?
क्या तुम भी यूं ही मुझे याद करते हो ? क्या तुम्हारे मन में भी मुझसे मिलने की तड़प होती है ? क्या तुम्हारा दिल भी घबराता है ? क्या तुम भी कभी आँख में आँसू भर लाते हो ? क्या तुम भी कभी उदास होते हो ? जिंदगी बहुत कम है ....बहुत कम बची है इन साँसों की आवाजाही ...खैर
प्रिय हम मिलेंगे, फिर मिलेंगे ॥बहुत जल्दी मिलेंगे ...
तब वही तारों भरी रात होगी ,,हर तरफ शांति होगी ,,,,वहाँ और कोई नहीं होगा सिवाय हमारी प्रकृति के ....एक वही तो है जो हमें मिलाएगी ....हमें खुशियाँ दिलाएगी ....
मुझे उस पर भरोसा है पूरा विश्वास है ...
प्रिय क्या तुम्हें पता है मैं आजकल बीमार हूँ ....मेरा ताप बार बार चढता है .....
लेकिन कोई बात नहीं ....
ऐसे तो तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि सदा तुम ऐसे ही रहे
तो किससे गिला करे
और कैसे गिला करें ....
क्रमशः
सीमा असीम
सुनो प्रिय
मैं जब तुम्हें लिखने बैठती हूँ चाँद उतर आता है कागज पर ...मैं तुम्हें आवाज लगाती हूँ और तुम आ जाते हो, ठहर जाते हो , और बतियाने लगते हो ॥फिर भी मैं न जाने क्यों तुमसे कभी कभी बहुत नाराज होती हूँ लेकिन कह नहीं पाती ...कुछ नहीं कह पाती ... क्या तुम मेरी नाराजगी कभी समझ पाते हो, कभी भाप पाते हो कि क्यों और किसलिए हूँ मैं तुमसे नाराज ....नहीं जानते न? कैसे समझ पाओगे तुम ?
फिर मैं खुद ही खुद को समझा देती हूँ कि शायद मेरी ही गलती हो .... या मेरे ही प्यार में कमी हो ,,मेरी श्र्धा में कमी है ,, मेरी आस्था में कमी है ,,मेरे विश्वास में कमी है ,,बहला लेती हूँ अपने मन को इसी तरह .....और तुम पर अपनी नाराजगी कभी ज़ाहिर ही नहीं होने देती .....एक दिन जब कभी तुम मिलोगे तो मैं तुमसे सारी शिकायत कर लूँगी ....प्रिय हम कब मिलेंगे ? हम कब साथ होंगे ? तुम क्यों नहीं आ जाते ।हमेशा हमेशा के लिए ...क्यों जाते हो पल भर को भी तुम ? क्यों आखिर क्यों ?
क्या तुम भी यूं ही मुझे याद करते हो ? क्या तुम्हारे मन में भी मुझसे मिलने की तड़प होती है ? क्या तुम्हारा दिल भी घबराता है ? क्या तुम भी कभी आँख में आँसू भर लाते हो ? क्या तुम भी कभी उदास होते हो ? जिंदगी बहुत कम है ....बहुत कम बची है इन साँसों की आवाजाही ...खैर
प्रिय हम मिलेंगे, फिर मिलेंगे ॥बहुत जल्दी मिलेंगे ...
तब वही तारों भरी रात होगी ,,हर तरफ शांति होगी ,,,,वहाँ और कोई नहीं होगा सिवाय हमारी प्रकृति के ....एक वही तो है जो हमें मिलाएगी ....हमें खुशियाँ दिलाएगी ....
मुझे उस पर भरोसा है पूरा विश्वास है ...
प्रिय क्या तुम्हें पता है मैं आजकल बीमार हूँ ....मेरा ताप बार बार चढता है .....
लेकिन कोई बात नहीं ....
ऐसे तो तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि सदा तुम ऐसे ही रहे
तो किससे गिला करे
और कैसे गिला करें ....
क्रमशः
सीमा असीम
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