गतांक से आगे 
रिया मुस्करा
चाँद को तकते तुम्हें याद करते
दीदार की दुआ मांग लेती हूँ 
सुनो प्रिय,
          कभी कभी तुम्हें याद करते हुए तुम्हारा नाम लेते हुए न जाने क्यों दिल सा घबराने लगता है एक एक शब्द को फिर मैं हल्के हल्के से लेती हूँ लेकिन दिल चाहता है कि मैं ज़ोर से आवाज लगाऊँ इतनी ज़ोर से कि पूरा जहां उस आवाज से गूंज जाये पर न जाने कैसे वो आवाज घुट सी जाती है मेरे भीतर ही कहीं और मन के अंदर मच जाता है हाहाकार सा ,,,क्यों प्रिय ऐसा क्यों होता है      क्यों नहीं सुन पते तुम मेरी आवाज मेरे बिना ज़ोर से लगाए ही ,,क्यों नहीं देख पाते मेरे मन की पीड़ा , बिना देखे ही ,,,क्यों नहीं पढ़ पाते मेरी आँखों का इंतजार ,,क्यों प्रिय ??
क्या सच को भी किसी गवाही की जरूरत होती है,मेरे प्रिय मेरी आँखों की नमी मेरे छलक़ते हुए अश्क झूठे नहीं हैं,मेरे मन में ख़्वाहिशों उम्मीदों का सिर्फ एक ही सच है सिर्फ एक ही, क्या तुम समझते हो प्रिय ? क्या तुम्हें पता है?क्या तुम जानते हो ?
अगर हाँ ,,,तो फिर क्यों तकलीफ ,,,कैसी तकलीफ ?
हाँ प्रिय सिर्फ तुम ही तो हो जो सब समझ कर भी अनजान हो कि ये लगन लग गयी है बस लगन ..... बस इसी लिए आँखें तरसती है याद में बरसती हैं
,लब से साँसों में नाम लेती रहती हैं ,,मेरे मन के लाख समझने पर भी नहीं समझती ,,नहीं समझती हैं प्रिय ,,,चलो अब तुम ही बता दो, समझा दो ,बहला दो ,,बोलो कर पाओगे ??
सुनो प्रिय जैसे कमल खिलता है न ठीक वैसे ही मेरा मन खिलता है ,,,सुबह को खिल जाता है लेकिन शाम होने तक वो मुरझाने लगता है लेकिन जब कभी पलक झपक जाती है तो मेरे ख्वाबों में तुम्हारा आना, बिना बोले, बिना बात किए, मुस्करा जाना, मेरे मन को फिर से खिला देता है, महका देता है, ,उस वक्त मैं गुनगुना उठती हूँ, कोई मोहक सा गीत और मेरे पाँव थिरक से उठते हैं इस लगन में कि मिल तो जाते हैं वो, ख्वाबों में, ख्यालों में, फिर कैसी ये धड़कनों में बेचैनी ? क्यों रातों में विरह की अग्नि ? जब आगे पीछे छाया की तरह से साथ हो तो क्यों घबराहट ? 
तुम हो मेरी आत्मा के सच्चे सहचर 
स्वच्छ धवल
तुम इंद्र्धनुष से हो सतरंगी 
रंग से भरे !!
क्रमशः 
सीमा असीम

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