गतांक से आगे
मैं कभी कभी यह सोचकर बहुत परेशान होती हूँ कि आखिर आज का इंसान क्या चाहता है ? वो क्यों इतनी ललसायेँ पाल लेता है ? क्यों भूल जाता है कि यह तन तो माटी का है और माटी में ही मिल जाएगा ,,,, हमारे साथ अक्सर गलत क्यों होता है ? जो सब कुछ बिना किसी शिकवा शिकायत के सहन कर लेता है उसे ही क्यों रोना पड़ता है? किसी को प्रेम करना गलत है ? किसी के साथ वफा निभाना सही नहीं है ? आखिर बेवफाई क्यों करते हैं लोग ? क्यों नहीं समझ पाते कि प्रेम इश्क इतनी पवित्र और सच्ची भावनाएं हैं कि इनके साथ छल करना, धोखा देना गुनाह ही तो है .....
आज जब सब कुछ झूठ छल प्रपंच पर ही टिका है तो प्रेम की क्या बिसात कि वो ईमानदारी और सच पर ही टिका रहे >>>>
लेकिन मुझे यह लगता है कि जब सच्चे प्रेम की शक्ति मन में होती है तो दुनियाँ की कोई ताकत हमें हरा नहीं सकती है बस यही सोचकर मैं प्रेम करती हूँ , मैं तुम्हें पाना नहीं चाहती , मैं तुमसे कुछ भी नहीं पाना चाहती , मैं नहीं चाहती कि तुम प्रतिकार में प्रेम दो ,,नहीं चाहती कि तुम वफा के बदले वफा दो ,,, नहीं चाहती कि तुम भी कोई दर्द सहो या गम में डुबो ,,,हाँ यह सच है और यही मेरा आखिरी सच है ,,,हमेशा की तरह इस बात को भी आजमा लेना ,,,,कि मैंने सह लिए सारे रंजो गम अकेले ही, तुमसे बिना कहे, बिना सुने ,,,,उस दर्द और तकलीफ का तुम्हें कभी अहसास ही नहीं होने दिया और न होने दूँगी ,,,मैं नहीं चाहती कि कभी तुम उस दर्द को महसूस भी कर पाओ ,,,,कभी कभी जब मैं दर्द के अथाह सागर में डूबी होती हूँ और आंखो से बहते अश्क थमते नहीं, तब रोते रोते मैं मुस्करा देती हूँ कि कहीं तुम्हें इस बात का अहसास न हो जाये क्योंकि तुम तो हँसते मुसकुराते हुए ही अच्छे लगते हो ,,,
मैंने तो सिर्फ प्रेम किया सिर्फ सच्चा प्रेम ,,,आज की झूठ की दुनियाँ में इसका कोई भी मोल नहीं ,,,फिर मेरा प्रेम तो अनमोल ही हुआ न ,,,, और सुनो प्रिय उससे भी ज्यादा अनमोल हो तुम,, जिसे मेरा प्रेम मिला ,,,,मैंने तुम्हें प्रेम किया ,,,,गर्व है मुझे तुम पर ,,,मेरे प्रेम पर ,,,,,
मेरी भावना, मेरा विश्वास और मेरी आत्मा के सहचर तुम सही हो हर रूप में हर हाल में कि प्रेम हो तुम मेरा,,,सिर्फ तुम ...
क्रमशः
सीमा असीम

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