तुम्हारा होना  ही बहुत है प्रिय
कहीं भी रहो ख़ुश रहो
ज़रूरी नहीं कि सुनाई दे
तुम्हारी सांसों का स्पंदन
लेकिन मुश्किल होता हैं
धूपबत्ती सी सुगन्धित
तुम्हारी यादों से महकते हुए
मन को समझाना
हाँ बहुत मुश्किल होता है
क्योंकि तुम्हारी यादें ही तो हैं
 जो मेरे मन को उदासियों से भर देती  हैं
उस वक़्त कुछ अच्छा नहीं लगता
साँस लेना भी नहीं
कोई वज़न सा महसूस होता है सीने पर
तब मैं यादों के सहारे तुम्हें
अपने पास कर लेती हूँ
और कर देती सारी शिकायतें
खूब झगड़ कर हल्का कर लेती हूँ
ख़ुद को यूँ ही
क्योंकि नहीं कह पाऊंगी कभी तुमसे
ग़लत को भी ग़लत
बस इतना कहूंगी कि होनी चाहिये परख तुम्हें
सच और झूठ की
असल और नक़ल की
सही और ग़लत की भी ! !
असीम

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