इश्क का रंग सफ़ेद पिया 
न छल न कपट न भेद पिया 
सौ रंग मिले तू एक वरगा 
आतिश होया रेत पिया रेत पिया 
सुनो प्रिय 
             तुम क्या सब समझते हो ? तुम क्या सब जानते हो ? क्या तुमने कभी महसूस किया ? क्या तुम्हें कभी अहसास हुआ ? क्या कभी तुमने उस दर्द को महसूस किया ? क्या कभी तुम्हें अनुभुति भी हुई है ? 
प्रिय तुम दिन पर दिन मेरे प्रेम के कर्जदार होते जा रहे हो ... कैसे चुका पाओगे तुम मेरा कर्ज ? सोचकर कभी कभी उदास सा हो जाती हूँ.... सुनो मेरे प्रियतम जब मैं तुम्हें दिल से पुकारती हूँ तब तुम्हारे दिल तक तो मेरी आवाज जरूर ही पहुँचती होगी फिर तुम इस तरह का व्यवहार क्यों करते हो जैसे तुम कुछ अनुभूत ही नहीं कर रहे ,,,,अब तुम्हारे सुख तुम्हारे दुख सिर्फ तुम्हारे थोड़े ही न हैं वे तो हमारे हैं हमारे साझे हैं ,,गम खुशियाँ 
प्रिय  क्या तुम जानते हो क्या तुम्हें पता है कि जब रात आतीं है तो रात नहीं आती जब दिन निकलता है तो दिन नहीं निकलता ,,,सूर्य के उगने से रोशनी नहीं बिखरती या चाँद के आसमा में आ जाने से रात रोशन नहीं होती ,,प्रिय यह तो सिर्फ प्रेम का प्रतीक भर हैं ....क्योंकि यह दुनियाँ सिर्फ प्रेम से ही चलती है प्रेम बिना जग सूना ....सुनो गर तुम न होते तो यह दुनियाँ इतनी प्यारी कैसे होती ? अगर तुम हो तभी खुशियाँ हैं ...सुनो सनम तुम मुझे हर हाल में, हर रूप में प्रिय हो ... गलत हो या सही हो कोई फर्क ही नहीं पड़ता क्योंकि मेरी नजर तुम्हें हमेशा उस नजर से ही देखती है जिस नजर से पहली बार तुम्हें देखा ....क्या तुम जानते हो ? क्या तुम्हें पता है कि तुम दुनियाँ में सबसे प्यारे हो ...मेरे सोहणा मैं तुम्हारे इश्क में जोगनी बन जाना चाहती हूँ ,,,सबकुछ भुला दिया है इस दुनियाँ को ही बिसरा दिया एक तेरे इश्क की खातिर ओ मेरे जोगी मैंने जोगिन का रूप अख़्तियार कर लिया है ,,, क्या तुम मुझे देखना चाहते हो ? क्या तुम मुझे मिलना चाहते हो ? 
सुनो मेरे दिल में बसने वाले मेरे स्वामी मैं तुम्हें एक बार देखना चाहती हूँ एक बार मिलना चाहती हूँ सिर्फ एक बार ,,,,हम तो अभी मिलने ही वाले थे फिर ऐसा क्यों ...और कितना इंतजार और कितना विरह ....सुनो प्रिय मेरे इंतजार के पल कैसे बिताए जाते हैं तुम सुनोगे ? देखो महीने को गिना जाता है फिर सप्ताह ,,फिर दिन ,,,फिर घंटे ,,,फिर मिनट और फिर सेकेंड और उन सेकेंडों के खत्म होते ही हमारे मिलन के पल आ जाते हैं और हम मिलते हैं एक बार फिर से बिछुड्ने को या सदा के लिए मिल जाने को ...लेकिन प्रिय इस बार तो महिना निकला ,,, सप्ताह निकले और दिन बीत ही रहे थे कि पल आने से पहले ही फिर इंतजार में महीने का वक्त आ गया ,,,ऐसा क्यों ...पहले कभी न हुआ फिर इस बार क्यों ? 
न मिलो, न बिछुड़ो, बस समाये रहो, यूं ही मेरे दिल में ,,मेरे जिगर में ..... ताकि मैं करती रहूँ तुमसे बातें, तुम्हारे बिना कहे  ही सुनती रहूँ तुम्हें ....मैं लिखती रहूँ तुम्हें ....सुनो मेरे प्रिय मैं तुम्हें गुनगुना चाहती हूँ या शायद मैं जीना चाहती हूँ ,,,,तुम लिखो वही प्रेम गीत ,,,जिसे पढ़कर मेरी दीवानगी न बढे , न घटे बस बस यूं ही बनी रहे ...ये जादू ये कशिश यूं ही कायम रहे ...
 मैं जिंदा हूँ या नहीं हूँ ,नहीं जानती
 हूँ मगन कि प्रेम मेरा सलामत रहे 
हो रही हूँ खाक आपके ख्वाबों की खातिर 
दर्द भरे जज़्बात मेरे दिल में सलामत रहे !! 
क्रमशः
सीमा असीम

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