गतांक से आगे
सुनो प्रिय ,,
जब मन बेहद उदास होता है तब बिलकुल भी कहीं पर मन ही नहीं लगता, कुछ भी करने का मन नहीं करता ...कप में रखी हुई चाय यूं ही पड़ी ठंडी हो जाती है लेकिन उसे पीने का भी बिलकुल भी इच्छा ही नहीं होती...तब मैं लिखने बैठ जाती हूँ एक प्रेम कविता....और भी ज्यादा गहराई से तुम में डूब कर.... लिखने लगती हूँ उसे अपने मन के कागज पर ...सुनो प्रिय मैं तो उबरना ही नहीं चाहती, एक पल को भी, एक क्षण को भी ...इस दुनियाँ से दूर खोई रहती हूँ बस तुम्हारे ही साथ न जाने कौन सी दुनियाँ में क्योंकि मैं कभी समझना ही नहीं चाहती ...कभी जानना ही नहीं चाहती इस दुनियाँ के रीति रिवाज रस्में ....
हल्की हल्की सी सिहरन लिए इस ठंड की शुरुआत में ...जब दूर होती है आँखों से नींद ॥तब यूं महसूस होता है कि कहीं दूर से सुरीली धुन मन को मोहती हुई सुनाई देती है जो मेरे मन को मोहित करती हुई ...दूर कर देती है मेरी सारी बेचैनी ...देखो मन की सारी उलझने सुलझने कैसे दूर हो जाती हैं और मैं खो जाती हूँ तुम्हारा हाथ पकड़े हुए कहीं भीड़ में ताकि कोई देख ही न सके हमें ...कोई पहचान ही न सके हमें ...तुम कस कर पकड़ लेते हो मेरा हाथ और मैं रख देती हूँ अपना माथा तुम्हारे वक्ष पर ...देखो प्रिय कैसे मुस्करा दिया वो पहाड़ पर झरते हुए झरने के पास बैठा वो वैरागी भी ...उन पहाड़ी जंगली फूलों पर टपकी हुई ओस की बूंदें मोतियों सी चमक उठी है .....मानों मुस्करा दिये हो तुम ॥कोई गीत गुनगुनाते हुए ....
क्रमशः
सीमा असीम
सुनो प्रिय ,,
जब मन बेहद उदास होता है तब बिलकुल भी कहीं पर मन ही नहीं लगता, कुछ भी करने का मन नहीं करता ...कप में रखी हुई चाय यूं ही पड़ी ठंडी हो जाती है लेकिन उसे पीने का भी बिलकुल भी इच्छा ही नहीं होती...तब मैं लिखने बैठ जाती हूँ एक प्रेम कविता....और भी ज्यादा गहराई से तुम में डूब कर.... लिखने लगती हूँ उसे अपने मन के कागज पर ...सुनो प्रिय मैं तो उबरना ही नहीं चाहती, एक पल को भी, एक क्षण को भी ...इस दुनियाँ से दूर खोई रहती हूँ बस तुम्हारे ही साथ न जाने कौन सी दुनियाँ में क्योंकि मैं कभी समझना ही नहीं चाहती ...कभी जानना ही नहीं चाहती इस दुनियाँ के रीति रिवाज रस्में ....
हल्की हल्की सी सिहरन लिए इस ठंड की शुरुआत में ...जब दूर होती है आँखों से नींद ॥तब यूं महसूस होता है कि कहीं दूर से सुरीली धुन मन को मोहती हुई सुनाई देती है जो मेरे मन को मोहित करती हुई ...दूर कर देती है मेरी सारी बेचैनी ...देखो मन की सारी उलझने सुलझने कैसे दूर हो जाती हैं और मैं खो जाती हूँ तुम्हारा हाथ पकड़े हुए कहीं भीड़ में ताकि कोई देख ही न सके हमें ...कोई पहचान ही न सके हमें ...तुम कस कर पकड़ लेते हो मेरा हाथ और मैं रख देती हूँ अपना माथा तुम्हारे वक्ष पर ...देखो प्रिय कैसे मुस्करा दिया वो पहाड़ पर झरते हुए झरने के पास बैठा वो वैरागी भी ...उन पहाड़ी जंगली फूलों पर टपकी हुई ओस की बूंदें मोतियों सी चमक उठी है .....मानों मुस्करा दिये हो तुम ॥कोई गीत गुनगुनाते हुए ....
क्रमशः
सीमा असीम
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