यूं गया है पूरा बरस 
अप्रैल मई जून जुलाई 
कितना तपाया 
अगस्त सितंबर अक्टूबर नबमबर 
शरद चाँदनी ने रुलाया 
हिचकी सिसकी 
अन्तर्मन में कितना कुछ टूटा फूटा 
मन का पंछी 
अंबर कभी धरती 
कितना तड़पाया 
आँखें टिकी रही रास्ते पर 
निहारती रही 
पल पल 
देखो कितनी धुंधली हुई रोशनी 
इतना पथ को  नैनों से बुहारा 
समझों पूरा बरस गया 
देखो वे देव हमारे इंतजार में बैठे हैं 
हमारी राह ताकते 
अपना सर उन्न्त किए 
क्या तुम्हें भान नहीं है प्रिय 
बर्फ से अटे पेड़ पौधे 
सर्द रातों में ठंड से ठिठुरने वाले हैं 
बूंद बूंद टपकती ओस की बूंदें 
मानों बहा रही हैं आँसू 
हमारे इंतजार में 
कोई गौरैया चहचहा कर 
भेज रही है निमंत्रण
स्वागत में बिछे फूल 
महका रहे हैं वादियों को 
प्रिय उन फूलों के मुरझाने से पहले 
उन चिड़ियों के जाने पहले 
पर्वतों के आमंत्रण का मान रखना 
हरे पेड़ों का हरापन बरकरार रखना 
कह रहा है प्रेम मेरा 
पुकार रहा है प्रेम मेरा 
भूल के एक बार सब कुछ 
डूब जाना है 
पार जाना है 
प्रिय पार जाना है !!
सीमा असीम

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