गतांक से आगे
रिया मुस्करा
नूर बरसता है सच पर 
बस इतना यकीन है !!
सुनो प्रिय 
जो तूम एक शब्द भर लिख  देते हो, या जो तुम एक शब्द भर कह देते हो, उसे पढ़ते  हुए, सुनते हुए, गुजर जाती है सारी रात यूं ही तुम्हें  याद  करते हुए, महसूस करते हुए, अहसासों में भरते हुए ...क्या तुम ऐसे ही हो या तुम जान बुझ कर ऐसे बनते हो, करते हो, प्रिय सुनो प्रेम किया तो अहम कैसा, क्यों और किसलिए ...कभी तो सोचा होता या महसूस किया होता या अहसासों में भरा होता .....
प्रिय रात भर यूं ही पिघलती रहती हूँ, तपती हूँ या जलती हूँ या यूं कि कहीं दूर से आती रहती है आवाज जिसे सुनते हुए गुजर जाती है पूरी रात ,,,, चाँद आया चमका या ओट ले ली चाँदनी की पता नहीं कोई फर्क ही नहीं पड़ता .....बस दिल में चराग सा जलता रहता है जो अहसास दिलाता है कि जीवित हूँ अभी खुद ही खुद के अहसासों में ...दिल कभी रूठ जाता है और कभी मना लेता है याद दिला जाता है कि प्रीत है निर्मोही से ....
सुबह की पहली किरण के निकलने से पहले बोझिल आँखें बंद होने लगती हैं लेकिन उन बंद आँखों में एक छवि होती है जो ख्वाबों में आ जाती है और पल भर में चौंक के आँख खुल जाती है कि कहीं ख्वाब टूट न जाये ...
उजड़ी-उजड़ी सी एक आस लगे
जिन्दगी जैसे वनवास सा लगे

समेट लूँ बाहों को फैला कर जहां 
मन क्यों हरपल उदास सा लगे !!
कितने शब्द लिखने होते हैं पर अटक अटक से जाते हैं... लिखते लिखते थम से जाते हैं और लगता है कि रुक जाऊँ ...कुछ पल ठहर जाऊँ ...थम जाऊँ लेकिन ठहरना कैसा ?थमना कैसा ? जब दिल हो सफर में ...ये सफर चलता ही रहता बिना रुके ...बिना थमें ....
ये आरजू है ,, यही जुस्तजू है ,सुलझा दो उलझन ,,कि रूबरू आ जाओ प्रिय तुम रूबरू मिल जाओ एक बार ही सही मेरे सामने आ जाओ ....क्रमशः 
सीमा असीम

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