गतांक से आगे ॥
कहाँ खो गयी मेरे लब की हंसी
कि आज दिल उदास है बहुत !!
यह रात का दूसरा पहर जब खत्म होने को है तब मैं अपनी नींद से बोझिल आँखों के साथ लिखने को मजबूर हूँ क्योंकि अगर अभी मैंने नहीं लिखा तो मेरे प्राण जो अधर में लटक गए हैं आकर और मेरे दिल की बेचैन धड़कने मुझसे इतने सवाल कर रही हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है ? उन्हें चैन नहीं मिलेगा ,,,,वैसे चैन सकूँ तो सब उस दिन ही खो दिया जिस दिन मुझे प्रेम हुआ ....मेरे प्रिय तुम ऐसा क्यों करते हो ?आखिर क्यों? क्या तुम जानते हो ? क्या तुम्हें पता है कि मेरी एक एक स्वांस तुम्हारा नाम लेती है हर पल में सिर्फ तुम्हें ही जीती है,,, क्या तुम मेरे अन्तर्मन में बसे मेरे  पवित्र  प्रेम को मिटा सकते हो ? क्या मेरी महकती स्वांसों की खुशबू तुम चुरा सकते हो ? बोलो प्रिय क्या तुम नहीं समझते कि मेरा प्रेम एक ताजी हवा के झोंके की तरह शीतल है, जो खुद ही सुलझा लेती है अपनी सारी उलझने, कितने भी दर्द या दुख हो उन्हें अकेले ही निभा लेती है, सह लेती सारी तकलीफ़ें अकेले ही, ताकि तुम्हें दे सके अपना निश्छल प्रेम,, मेरे प्रिय जब ट्रेन चलती है तब सब पेड़ पौधे पीछे छूटते जाते हैं लेकिन अंधेरी सर्द रात में भी चाँद अपने पूरे बेग के साथ संग संग दौड़ता हुआ चला आता है उसे नहीं होती है परवाह किसी भी आँधी या तूफान की ,वो बस साथ नहीं छोडता अपने डूब जाने तक,,,,, यूं ही मेरा प्रेम तुम्हारा साथ निभाता हुआ चला आ रहा है हाथ में हाथ थामें हुए ....
सुनो प्रिय कभी कभी जब किसी दिन नींद से चौंक कर जाग जाती हूँ तो मेरे दिल की धड़कती तेज धड़कनों को मेरा बेचैन मन काबू नहीं कर पाता और मैं कराह उठती हूँ,,, मेरी आत्मा तक गीली हो जाती है उस वक्त मैं तुमसे बात करने को इतनी उतावली हो  जाती हूँ कि बहते हुए दरिया को भी दौड़ते हुए पार करके तुम्हारे करीब आ जाना चाहती हूँ और कह देना चाहती हूँ अपने मन की सारी बातें तुमसे बिना कहे ही ,,,तब मैं और भी ज्यादा गहरे डूब जाना चाहती हूँ तुम्हारे प्रेम में ,,,तुम्हारे वक्ष पर रखकर अपना सर यूं ही गुजार देना चाहती हूँ अपना पूरा जीवन ,,, मुझे पता है तुम भी करते हो मुझे इतना ही प्रेम ,,,,तुम भी रहते हो इतना ही उदास, निराश, हताश तभी तुम साध लेते हो मौन .....क्योंकि प्रेम पलता दो हृदय में ...तुम जीने लगते हो दर्द के आगोश में ...लेकिन तुम्हारा यह मौन या तुम्हारा दर्द मुझे और भी ज्यादा तकलीफ से भर देता है और मेरे अश्क यूं ही बहते रहते हैं ,,,रुकते ही नहीं लाख कोशिश कर लो ,,,और वे यूं ही बह बह कर गालों पर निशान छोडते जाते हैं सूख सूख कर क्योंकि मेरा मन ही नहीं करता उन अशकों को पोछने का,, मैं ना जाने तब किस दुनियाँ में पहुँच जाती हूँ ...उदास, क्लांत मन अथाह दुख के सागर में गोते लगाने लगता है,,, प्रिय मेरा दिल आज तुम्हें बेचैनी से भरकर पुकार उठा है ,,,,,कितनी ही अनगिनत, अनकही बातों को तुमसे करने को आतुर हो उठा है प्रिय मैं तुमसे बातें करना चाहती हूँ ,,देवदार के साये तले बैठ कर सुखद सर्द हवा के झोंको को हमने ओढ़ी हुई गरम शाल में सहते हुए ,गुनगुनाना चाहती हूँ, वही गीत तुम्हारे स्वर में स्वर मिलाकर जो अक्सर तुम अकेले ही मेरे लिए गाया करते थे, तो प्रिय आओ आओ मेरी दुआ के साथ चले आओ कि आज मेरा दिल बहुत उदास है .......क्रमशः 
सीमा असीम











Comments

  1. प्रेम की बेहतरीन अभिव्यक्ति! सीमा तुम्हें सच में किसी से प्यार हो गया है।

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