कह दो न

मैं हमेशा अपने मन की पल पल की भावनायें तुम्हें बताना चाहती हूँ
जैसे आज मैं कितनी ख़ुश थी यह बात या आज कैसा मौसम था
या आजकल सर्दी थोड़ा बढ़ गयी है 

मैं बता देना चाहती हूँ कि
रात की उदासी में मेरे मन की उल्लसित तरंगें
तुम्हें अपने अंक में भरकर बाँट लेना चाहती हैं 

तुम्हारी वो तकलीफ़ें जो तुम कह ही नहीं पाते कभी 
 मैं यह भी बताने की सोचती हूँ
कि अगर मैं तुमसे नहीं कह पाती कोई बात
तो कितनी तक़लीफ़ में जीती हूँ
कितना दर्द होता है
यूँ जैसे दुःख कि बदली छा गयी है
मुझे खामोशियां उदासियां बिल्कुल अच्छी नहीं लगती
तभी तो मैं स्वतः तोड़ देती हूँ मौन
और कर लेती हूँ तुमसे बातें
तब भी कहाँ कह पाती हूँ सब कुछ
रह जाता है अधूरा पन सा
क्योंकि मैं बताना चाहती हूँ अपनी
उलझने सुलझने
सही ग़लत
झूठ सच
सुबह उठने से लेकर
रात के सोने तक की एक एक
बात बताकर
एकदम पारदर्शी होकर
ख़ुद को मज़बूत कर लेना चाहती हूँ
क्योंकि कमज़ोर हो जाना
ज़िंदगी न जीने के समान हो जाता है

तो कह देना कभी फुर्सत में 
अपने मन की बातें 
सुख दुख सब 
एक हैं अपने 
कि अलग नहीं हो 
तुम मुझसे ! !
सीमा असीम

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