अति सर्वत्र वर्जयेत

 हे मूर्ख इंसान इतनी अति मत फांक कि धरती आसमान डोल जाये और खुल जाये भोले बाबा का तीसरा नेत्र , डर तू अपने कर्मों से, डर तू लोगो को सताने से, मूर्ख बना कर दुनिया को खुद को होशियार समझता है ...प्रकृति को नष्ट करके नोच खरोच और नुकसान करके खुद आगे बढ्न चाहता है ... बोल हे मूर्ख इंसान आखिर तू इस दुनिया से क्या चाहता है कितना लूटना चाहता है , कितना इकट्ठा करना चाहता है , आखिर तू क्यों है इतना कुटिल और छल वल से भरा हुआ, क्या तुझे समझ नहीं आता आज तू विनाश कर रहा है एक दिन तेरा विनाश हो जाएगा , टूट पड़ेगा तुझ पर ही प्रकृति का कहर , तब तू पछताएगा , दर्द से बिलबिला जायेगा , नहीं आएगा तुझ पर किसी का रहम ,न तू चैन की सांस ले पाएगा , घुट जायेगा तेरा भी दम , ओ मूर्ख मानव क्या तू अभी भी नहीं सुधरेगा , कितना और लूटेगा , कितना और बर्बाद करेगा , संभल जा अभी भी वक्त है कि अब प्रकृति घबरा उठी है और त्राहि त्राहि करने लगी है ,,,,

24,1,20 

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