कितना कुछ कहना चाहती हूँ मैं
हाँ तुमसे सिर्फ बातें करना चाहती हूँ
यही तो सच है न कि मैं तुमसे ढेर सारी बातें करके खुद को हल्का करना चाहती हूँ , क्या तुम जानते नहीं कि मेरे मन में कितनी सारी बातें भरी हुई हैं जो एक दूसरे में उलझ कर गांठ सी बन रही हैं कुछ करो न ऐसा कि मैं तुमसे अपने मन की एक एक बात कह दूँ और खाली हो जाऊँ और उलझने सुलझ जाये मेरा मन फूल सा हल्का हो जाये जिससे मैं आसानी से फुदक सकु मन का कर सकूँ खुशियाँ मना सकु और खूब झूम कर नाच लूँ , मैं तुमसे बेपनाह प्रेम करती हूँ न तो मैं उस पवित्र निर्मल और अपने अडिग प्रेम में तुमको डुबो सकूँ वैसे तुम दुबे हुए ही हो और सर तक दुबे हुए हो तुम तैरने की कोशिश तो करते हो लेकिन अनाड़ी तैराक की तरह अपने हाथ पाँव चलते हो और फिर से गहरे में डूब जाते हो ,,मत कोशिश करो तैरने की तुम डूबे ही रहो गहरे और गहरे ,,,,,
कि तुमसे ही है अब मेरी जिंदगी की सांझ ओ सहर
कि तुम बिन जिंदगी का एक पल भी गवारा नहीं है ...
सीमा असीम
7,1,20 

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