छलछल करके आंसुओं का छलकना मुझे अच्छा नही लागता हर दम मुझे उदास होना अच्छा नहीं लगता बार तुम्हारे ख्यालों में खोना भी मुझे अच्छा नहीं लगता हाँ प्रिय सनम मुझे रोना धोना बिल्कुल नापसंद है फिर भी मैं अपनी आँसू भरी आँखों को छलक़ने से रोक नहीं पाती हूँ बहते हैं मेरे आँसू और मैं किसी गहरी खामोशी में डूब जाती हूँ कितनी अथाह गहराई है उतरती चली जाती हूँ गहरे गहरे और गहरे जहां मेरा दम घुटने लगता है घबराहट होने लगती है मैं छटपटा उठती हूँ उबरने के लिए तुम्हारा सहारा ढूँढने लगती हूँ कितुम हाथ बढ़ाकर मुझे उबार लो मैं स्वांस ले सकूँ मैं दर्द से राहत पा सकूँ रखकर तुम्हारे कंधे पर अपना सर कुछ अपने मन का बोझ उतार सकूँ हाँ देखो न कितना भारी भारी है मेरा मन तभी तो छलक पड़ता है बार बार तुम भी तो यूं ही करते हो न मैंने देखा है तुम्हें यूं ही गाहे बगाहे अपनी आँखों को छलकाते हुए कभी भी कहीं भी अपनी उदासी को ठहाके मार कर छुपाते हुए कहो न प्रिय बोलो मुझसे कोई भी बात कि शाम की गहरी उदासी कुछ कम हो जाये आओ चलो धाम लो मेरा हाथ अपने हाथ में खूब कसकर और दुख दूर हो जाएँ हाँ गम मिट जाये !!सीमा असीम 15,1,20
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