मेरा मन क्यों तुम्हें चाहें
मेरा मन
सुनो मैं तुम्हें अब कभी आवाज नहीं लगाना चाहती , अब मैं तुमसे कभी कुछ कहना नहीं चाहती , हाँ मैं नहीं चाहती कि मैं तुम्हें सब कुछ कह कर हल्की हो जाऊँ ,,क्यों कहें तुमसे अब हम अपने मन की कोई भी बात क्या तुम्हें नहीं लगता ,क्या तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आता ,क्या तुम्हें मेरी परवाह नहीं होती , कि मैं कैसे जी रही हूँ , मैं कितना याद कर रही हूँ , मैं पल भर को तुम्हें भुला नहीं पाती ख्यालों या ख्वाबों में तुम ही हो , कहीं भी हो ए लेकिन मेरे आसपास तुम्हारा ही डेरा है मेरे रोम रोम में तुम और मेरी नसों में लहू बनकर बहते हो फिर क्यों लगाए हम तुम्हें आवाज ,, क्या तुम्हारा फर्ज़ नहीं बनता कि मेरे बारे में जानो ,, मेरे प्रति तुम्हारे मन में भी फिक्र हो , मैं तकलीफ में हूँ तो आगे बढ़कर मेरा हाथ थाम लो और मुझे उबार लो हर दर्द और तकलीफ से , जब मैं रो रही होती हूँ तब आकर मेरे आँसू पोंछ दो और मुझे सब्र बंधा दो ! मैं बेजान हो जाती हूँ , निढाल सी कहीं पड़ी रहती हूँ तब मैं तुम्हारा  आसरा ताकती रहती हूँ लेकिन मैं हमेशा निराश हो जाती हूँ क्योंकि तुम स्वार्थी हो और अपने स्वार्थ में सब भूल जाते हो कुछ याद नहीं रखते लेकिन प्रिय यह दर्द एक दिन तुम्हें भी यूं ही सताएगा और तुम तड़प जाओगे , मेरी ही तरह बहने लगेगे तुम्हारे अश्क और बहते ही रहेंगे तब समझोगे कि प्रेम क्या होता है और इसका दर्द क्या होता है ,,,
सीमा असीम
20,1,20 

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