झरती रहती है ओस भीगती रहती है जमी
नमी कम आसमा पर भी तो नहीं है
सुनो यही सच है न कि कोहरे में डूबा हुआ है जब पूरा शहर तब मैं लिखने बैठी हूँ जब सभी अपनी रजाइयों में दुबके हुए सो रहे हैं ,,,,मेरे पैर ठंड से शीत हुए जा रहे हैं मानों अकड़ गए हैं लेकिन हर बात से बेखबर मैं अपनी ही धुन में मगन लिख रही हूँ ,,,कि दिन भर गम और दर्द में डूबा हुआ मन तड़प उठा है ,,अचानक यकीन ही नहीं होता जब किसी बड़े नाम को आरोपो से घिरे हुए पाती हूँ ,,मुझे एक बात बिलकुल समझ नहीं आती है कि किसी भी गलती के लिए कोई एक दोषी कैसे हो सकता है , जब दोनों ही समझ दार हैं तो गलती का दोष पुरुष को ही क्यों ? क्या उसमें स्त्री की सहभागिता नहीं थी ? क्या वो अंजान थी ? क्या उसे कोई बात समझ नहीं आ रही थी ? क्या पुरुष इसलिए दोषी मान लिया जाता है कि वो पुरुष है ? लेकिन अगर एक पुरुष जो किसी भी स्त्री को अपना समझता तो नहीं है लेकिन उसका शोषण करता रहे ,और वो लगातार करता रहे ! स्त्री कमजोर पद जाये और पुरुष जबर पड़ जाये दबाता ही जाये उसको , तो क्या उसको कोई तकलीफ नहीं होती , उसकी स्वयम की आत्मा उसे झकझोरती नहीं है ? उसे अहसास नहीं होता है किसी के दर्द का ,,वो किसी स्त्री की आँखों में आँसू भर देता है ॥कैसे जी पाता होगा या सो पाता होगा चैन की नींद ? हाँ खा पी तो चैन से ही लेता होगा बल्कि कुछ ज्यादा ही क्योंकि उसे तकलीफ का अहसास नहीं है ....
नहीं होता होगा तुम्हें कोई अहसास
तुम कैसे समझोगे मेरे दर्द भला !!
सीमा असीम
11,1,20
नमी कम आसमा पर भी तो नहीं है
सुनो यही सच है न कि कोहरे में डूबा हुआ है जब पूरा शहर तब मैं लिखने बैठी हूँ जब सभी अपनी रजाइयों में दुबके हुए सो रहे हैं ,,,,मेरे पैर ठंड से शीत हुए जा रहे हैं मानों अकड़ गए हैं लेकिन हर बात से बेखबर मैं अपनी ही धुन में मगन लिख रही हूँ ,,,कि दिन भर गम और दर्द में डूबा हुआ मन तड़प उठा है ,,अचानक यकीन ही नहीं होता जब किसी बड़े नाम को आरोपो से घिरे हुए पाती हूँ ,,मुझे एक बात बिलकुल समझ नहीं आती है कि किसी भी गलती के लिए कोई एक दोषी कैसे हो सकता है , जब दोनों ही समझ दार हैं तो गलती का दोष पुरुष को ही क्यों ? क्या उसमें स्त्री की सहभागिता नहीं थी ? क्या वो अंजान थी ? क्या उसे कोई बात समझ नहीं आ रही थी ? क्या पुरुष इसलिए दोषी मान लिया जाता है कि वो पुरुष है ? लेकिन अगर एक पुरुष जो किसी भी स्त्री को अपना समझता तो नहीं है लेकिन उसका शोषण करता रहे ,और वो लगातार करता रहे ! स्त्री कमजोर पद जाये और पुरुष जबर पड़ जाये दबाता ही जाये उसको , तो क्या उसको कोई तकलीफ नहीं होती , उसकी स्वयम की आत्मा उसे झकझोरती नहीं है ? उसे अहसास नहीं होता है किसी के दर्द का ,,वो किसी स्त्री की आँखों में आँसू भर देता है ॥कैसे जी पाता होगा या सो पाता होगा चैन की नींद ? हाँ खा पी तो चैन से ही लेता होगा बल्कि कुछ ज्यादा ही क्योंकि उसे तकलीफ का अहसास नहीं है ....
नहीं होता होगा तुम्हें कोई अहसास
तुम कैसे समझोगे मेरे दर्द भला !!
सीमा असीम
11,1,20
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