चलो आज मैं लिखती हूँ मुस्कान
क्यों रोएँ हम यूं बार बार
सुनो कितना अच्छा लगता है न मुसकुराना ,जब फूल कही अपने रंग और खुशबू के साथ खिले दिखते है तो देखो मन कैसे मुस्कुरा देता है ...हैं न ? तुम्हें भी तो अच्छे लगते हैं यह फूलों के रंग इनकी खुश्बु ,,तुम भी तो इनके  जैसे ही मुस्कुराते हो न , कितनी प्यारी है तुम्हारी मुस्कान , सुनो तुम्हारे चेहरे पर उदासी अच्छी नहीं लगती है ॥जैसे मुझे रोना अच्छा नहीं लगता है , जब मैं रोती हूँ तब सारी कायनात मेरे साथ रो पड़ती है उदास हो जाती है सारी दुनिया तभी तो मैं हँसना चाहती हूँ ,ज़ोर ज़ोर से खिलखिला कर हँसना ,अपनी दोनों बाँहें फैला कर आसमा को समेट लेना , जब तुम साथ होते हो तब मैं तुम्हें खूब स्नेह से देखती हूँ , खूब वात्सल्य लुटाती हूँ और बदले में मुझे मिलता है तुम्हारा दुगुना प्यार , यह दुनिया बस इसलिए ही जीवित है कि अभी बचा हुआ है प्रेम , और बचये रखूंगी , अपने अन्तर्मन में छुपाये रखूंगी , जिस दिन मेरा प्रेम नहीं होगा यह दुनिया खत्म हो जाएगी , क्योंकि तब द्वेष हाबी हो जायेगा और द्वेष यानि मृत्यु ,,,,
मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती और न कुछ पाना चाहती हूँ ,तुम स्वतः इतना दे देते हो कि मैं समेट तक न पाऊँ ,,,हाँ यही सच है कि भरा हुआ है लबालब मेरे प्रेम का सागर और यूं ही भरा रहेगा ,,तो सुनो अब तुम मुसकुराते रहना उदासी को त्याग कर ,,,,
महकता रहा सदा मेरे अरमानों का दरख्त
मैं उसे नितदिन सच्चे मन से सींचती रहूँगी
सीमा असीम
12,1,20 

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