चाहता है मन कि दौड़ती हुई जाऊँ
आसमा तक
और चाँद को लगाकर गले
दिल में छिपा लूँ
हाथ से छूकर सूर्य को
सागर की ठंडी रेत पर
लेट जाऊँ
लगाती रहूँ करवटें
लपेट कर अपने तन पर
वो चमकती हुई रेत
तन को शुद्ध बनाऊँ
मन तो पवित्र शुद्ध निर्मल है
बस इस निर्लज्ज दुनियाँ में
अपनी हया के संग जी जाऊँ ,,
सीमा असीम
9,1,20 

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