अपने
दुख जाये जब मन
दो अश्क छलका लेना
न करना कभी शिकायत
न कभी गिला करना
तुम मेरे हो, हूँ तुम्हारी मैं
फिर अपनों से क्यों
अपने मन की कहना
कि आता है उन्हें पढ्ना
हर बात बिन कहे ही !
सीमा असीम
17,1,20

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