तू ही रे, तू ही रे
तेरे बिना मैं कैसे जीऊँ ,,,,
तुम हो तो है जिंदगी
तुम बिन कुछ भी नहीं
सुनो मैं जब दर्द से तड़प उठती हूँ तब मुझे सच्चे इंसान के कंधे की सख्त जरूरत होती है कि मैं जी भर कर अपने आंसुओं को बहा सकूँ लेकिन मुझे कोई सच्चा शख्स दुनिया में नजर ही नहीं आता या तो मैं झूठी हो गयी हूँ , सच में मैं अपनी ही गलतियाँ ढूँढने लगती हूँ शायद मुझ में ही कोई कमी रह गयी होगी या मेरा ही प्रेम सच्चा नहीं होगा या मैंने कभी कोई गलत काम किया होगा ,,पर प्रिय जबसे मैंने तुम्हें अपना माना है किसी और को अपना समझा ही नहीं , न ही किसी को कभी कोई हक दिया कि कोई मुझे अपना कह सके या अपना मानने ही हिम्मत कर सके , मैं तो तेरी हो गयी हूँ सिर्फ तेरी और किसी की भी नहीं ! कोई चाहें दुनिया की सारी खुशियाँ हीरे पन्ने लाकर दे दे ,उसे कोई हक नहीं कि मुझे अपनी उंगली से भी छु सके सिर्फ यही एक सच है कि मैं तेरी हूँ सनम और तुम किसके हो और कितने सच्चे हो यह तुम्हारा मन जाने या तुम खुद स्वयम क्योंकि प्रिय हम सिर्फ अपने बारे में ही तो कोई राय बना सकते हैं या खुद को ही तो सच्चा और ईमानदार बना सकते हैं कोई कैसा है हम क्या जाने हम किसी को जबर्दस्ती नहीं कर सकते हैं न ,
तुम खुश रहो इतनी सी दुआ है मेरी
मुझे तुमसे कभी कोई गीला शिकवा ही नहीं है
सीमा असीम
20, 1 20 

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