यह तन और मन का कैसा अजीब सा रिश्ता है ,,जब मन अच्छा न हो तब तन भी कोई काम नहीं करना चाहता ,उदास होकर बैठा रहता है तन एक पोटली सा बनकर ,,,, कुछ भी करने का मन ही नहीं होता न तन साथ देता है बस आँखों से आँसू बहते रहते हैं और दुआ में हाथ उठ जाते हैं बार बार ,,,हे मेरे ईश्वर तुझसे कोई बात तो छिपी नहीं है न , तू तो सब जानता ही है , फिर मेरे मन को इतना कष्ट क्यों देता है ? क्यों मेरा मन दर्द के अथाह सागर में डूब जाता है जहां से कुछ नजर नहीं आता सिर्फ तुम ही तुम दिखते हो और कोई कोई भी नहीं , मुझे सच बताओ मुझे इतना दुख क्यों देते हो बताओ बोलो न ? क्या तुम्हें मेरा हँसना ,मुसकुराना ,मस्त रहना पसंद नहीं है ? क्या तुम नहीं चाहते मैं खुश होकर गुनगुना दूँ ? खिलखिला कर तुम्हें अपने गले से लगा लूँ फिर खूब देर तक हम हँसते रहे कोई गीत गाते रहे , जिसे सुनकर दुनिया भी मुस्कुरा पड़े , क्या तुम्हें मेरे खुश होने से दुख होता जो हर बात पर मेरा दिल दुखा देते हो बोलो बताओ मुझे ? जब मैं तुम्हारी खुशी के लिए निसार हूँ तो तुम क्यों मुझसे मेरी हंसी छीन कर गम भर देते हो मेरे दिल में , लेकिन एक बात तो तुमको ध्यान रखनी ही होगी इस दिल में तुम ही रहते हो इसलिए मैं दुखी होती हूँ तो तुम उससे कहीं ज्यादा दुखी हो जाओगे , जब मैं रोती हूँ तो तुम मेरे जितने आँसू गिरते हैं उससे कहीं ज्यादा तुम्हारे आँसू गिरते होंगे , यह सब होता ही होगा मुझे पूरा विश्वास है ! जब मैं फूट फूट कर तड़प कर ज़ोर से रोती हूँ न तो सिर्फ मेरे दिल को ही तकलीफ नहीं होती बल्कि तेरा दिल मुझसे भी ज्यादा दुखी हो जाता होगा ! हैं न ? बताओ मुझे बोलो मुझसे , क्यों देते हो मुझे दुख , क्यों रुलाते हो मुझे , क्यों तड़पा देते हो और मेरा तन मन सब निर्जीव बना देते हो , बताओ बोलो क्यों करते हो ऐसा मेरे साथ ,,,,
सीमा असीम
19,1,20
सीमा असीम
19,1,20
Comments
Post a Comment