अय मेरे दिल मुस्कुरा तू इतनी ज़ोर से
कि सारी घबराहट दूर हो जाये ...




हे मेरे ईश्वर, 



जब दिल बुरी तरह घबरा जाता है ,घुटन से भर जाता है तो बस मन दो बातें ही चाहता है या तो खत्म हो जाये इस  दुनिया से झूठ या फिर  सच का कभी कोई दिल ना दुखाए ,,,कि दुखता है जब दिल तो आँसू बहते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी थमते नहीं हैं , बेजान सा जिस्म हर कार्य  को करने से इंकार कर देता है .....न जाने क्यों उलझता है मन और फिर लाख कोशिश करो सुलझता नहीं है क्योंकि मन से उठने वाले सवालों के जवाब खुद ही मन को देने होते हैं और वे सही हैं या गलत हम सिर्फ अहसास के सहारे ही निर्णय कर पाते हैं और हम नहीं चाहते कि मेरी बजह से किसी का जरा भी दिल दुखे या उसे कोई तकलीफ हो इसलिए हम अकेले ही सारे गम सारे दर्द सहते हैं , रोते हैं चीखते हैं चिल्लाते हैं और खुद को ही घायल कर लेते हैं ,,,,जख्मी होकर तड़पते हैं लहूलुहान कर लेते हैं और फिर उन जख्मों से टपकता है लहू , बहता है लाल सुर्ख खून ,,,,
दीवानेपन की सारी हदें पार करके उसके चरम का स्पर्श का लेती हैं और हो जाती हैं दर्द की इंतिहां पार ,,,,
फिर रोते रोते मुस्कुरा उठता है मन, खिलखिला उठता है और ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाने लगता है ,,,मन भूल कर सारी दुनिया खुद में सिमट जाता है और तब खुल जाता है ज्ञान का तीसरा नेत्र ,,समझता है अपनी नदानिया अपनी गलतियाँ , अपनी भूलें ,,, जाग जाता है मन ...अंधेरे से निकल कर ...रोशनी से तरबतर हो जाता है ,,,,,,
चरम तक पहुँच जाता है, अंत तक..........
तू क्यों परवाह करता है मन क्यों किसी बात से मुस्काता है
मत घबराना अब कभी तू कि रोशनी में जरा आकर तो देख ....
सीमा असीम
25,1,20 

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