मेरे बिव्हल मन में तुम्हारी याद रहती है
कि मैं बेमन की हो गयी हूँ इनदिनों
सुनो हे मेरे ईश्वर
 चाहती हूँ मैं कि सोचूँ खुद को लेकिन मैं सोचने लगती हूँ तुम्हें, कितना चाहती हूँ देखूँ आईने में खुद को लेकिन देखने लगती हूँ तुम्हें , मैं चाहती हूँ जी लूँ कुछ पल खुद के लिए लेकिन जीती रहती हूँ तुम्हें सिर्फ तुम्हें ,,,हाँ मेरे प्रिय तुम शायद मेरे मन के भाव जानते और समझते हो तभी आकर बैठ गए हो खुद ही मेरे मन में धूनी रमाकर तभी तो तुम्हारे सिवाय मेरे मन न कोई भाता है न कोई टिकता है ,लेकिन एक बात समझ नहीं आती है कि जब मेरे मन में तुम बसे हो तो मेरी आँखों में आँसू क्यों भरे हैं , क्यों मन भारी होता है और गहरी उदासी आ जाती है क्या तुम परेशान हो या किसी तकलीफ में जो मैं यहा दुखी हो जाती हूँ पता है तुम्हें मैं खुद को बहलाने समझाने का कितना काम करती हूँ जिससे तुम पर इस दुख दर्द और तकलीफ की कोई छाया न पड़े !
मुस्कुरा अय मेरी जिंदगी
कि मेरा सनम उदास न हो जाये !
सीमा असीम
21,1,20 

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