क्या कहूँ मैं खुद को
क्या न कहूँ अब ॥
अपनी मूर्खता पर ज़ोर से हंसने का मन कर रहा है लेकिन मैं तो रो रही हूँ, चीख रही हूँ और खुद को ही चोट पहुंचा रही लेकिन यह जो चोटें मैं खुद को दे रही हूँ इन चोटों का भयंकर दर्द भी मेरी उस चोट को संभाल नहीं पा रहा है मरहम नहीं लगा पा रहा है जो मेरे दिल पर लग रही है और बार बार उस चोट को ही और गहरी चोट पहुंचा रहा है ,,,,मानों यह जिस्म घायल पंछी बन गया है और बेबस होकर तड़प रहा है ,,,आह, निकल कर उड़ पाता यह पंछी , आह, किसी तरह तो मिलती दिल को राहत, आह, कुछ पल तो जी लेती मैं चैन से ... हे मेरे ईश्वर मुझे शक्ति दो मेरे कमजोर मन को इतना ज्यादा कमजोर मत बनाओ जिससे जीने की हर उम्मीद मैं अपने ही हाथो खत्म कर दूँ और फिर यह दुनिया अपनी रफ्तार से यूं ही चलती रहे ,,,
क्या मैं इसलिए इतनी कमजोर पड रही हूँ कि मैं सच हूँ अगर हाँ तो मैं ऐसे ही बनी रहूँगी कोई कितना मुझे मजबूर करेगा और मुझे यूं ही सताता रहेगा ...समझ नहीं आता है कैसे मैं अपने दुख को लिख सकूँगी , कैसे अपने आंसुओं को संभाल सकूँगी , नहीं संभाल रहा कुछ भी ,,, नहीं समझ आ रहा कुछ भी ... इस बेईंतिहा कष्ट से कैसे उबर पाएगा मन ,
ओहह यह मेरा तन्हा,उदास मन
जीने नहीं दे रहा मुझे मेरा मन
सीमा असीम
22,1,20 

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