गतांक से आगे रिया मुस्करा उदास शामों की सलवटें अक्सर अपना निशान छोड़ जाती हैं ! जाने क्यों कुछ शाम उदास होती हैं कुछ शामें उदास कर जाती हैं सुनो प्रिय, न जाने क्यों मुस्कराते हुए भी अक्सर मन उदासियों में घिर जाता है और आँखों से अश्रु बहने लगते हैं थमते ही नहीं न जाने क्यों ऐसा हो जाता है ? न जाने क्यों मन जिद सी बांध लेता है किसी मासूम बच्चे की तरह कि बस तुम ही हो मेरे, सिर्फ तुम ,,,,न जाने मन के भीतर क्या पलता चला जा रहा है ....कभी जमता है, कभी पिघलता है, न जाने क्या है ? जो बेवजह आँखों को नम कर देता है,,, सुनो प्रिय, ये मेरा हँसते हँसते, मुस्कराते मुस्कराते हुए अचानक से रो देना,,, न जाने क्यों इतना दुखी हो जाता है दिल कि घबरा जाता है इस दुनियाँ के रीति रिवाजों से ,,,,तभी आ जाता है तुम्हारा ख्याल और मैं रोते रोते हुए भी मुस्कराने लगती हूँ प्रिय कि कहीं तुम भी उदासियों में न घिर जाओ ....प्रिय मेरा प्रेम बस यूं ही है लेकिन बहुत मासूम है, बहुत भोला है, बहुत नादान है कभी भी आजमा लेना है,,, ये पल में मान जाता है और तुम्हे...