Posts

Showing posts from November, 2017
Image
  गतांक से आगे  रिया मुस्करा उदास शामों की सलवटें अक्सर अपना निशान छोड़ जाती हैं ! जाने क्यों कुछ शाम उदास होती हैं कुछ शामें उदास कर जाती हैं सुनो प्रिय,             न जाने क्यों मुस्कराते हुए भी अक्सर मन उदासियों में घिर जाता है और आँखों से अश्रु बहने लगते हैं थमते ही नहीं न जाने क्यों ऐसा हो जाता है ? न जाने क्यों मन जिद सी बांध लेता है किसी मासूम बच्चे की तरह कि बस तुम ही हो मेरे, सिर्फ तुम ,,,,न जाने मन के भीतर क्या पलता चला जा रहा है ....कभी जमता है, कभी पिघलता है, न जाने क्या है ? जो बेवजह आँखों को नम कर देता है,,, सुनो प्रिय, ये मेरा हँसते हँसते, मुस्कराते मुस्कराते हुए अचानक से रो देना,,, न जाने क्यों इतना दुखी हो जाता है दिल कि घबरा जाता है इस दुनियाँ के रीति रिवाजों से ,,,,तभी आ जाता है तुम्हारा ख्याल और मैं रोते रोते हुए भी मुस्कराने लगती हूँ प्रिय कि कहीं तुम भी उदासियों में न घिर जाओ ....प्रिय मेरा प्रेम बस यूं ही है लेकिन बहुत मासूम है, बहुत भोला है, बहुत नादान है कभी भी आजमा लेना है,,, ये पल में मान जाता है और तुम्हे...
Image
तुम्हारा होना  ही बहुत है प्रिय कहीं भी रहो ख़ुश रहो ज़रूरी नहीं कि सुनाई दे तुम्हारी सांसों का स्पंदन लेकिन मुश्किल होता हैं धूपबत्ती सी सुगन्धित तुम्हारी यादों से महकते हुए मन को समझाना हाँ बहुत मुश्किल होता है क्योंकि तुम्हारी यादें ही तो हैं  जो मेरे मन को उदासियों से भर देती  हैं उस वक़्त कुछ अच्छा नहीं लगता साँस लेना भी नहीं कोई वज़न सा महसूस होता है सीने पर तब मैं यादों के सहारे तुम्हें अपने पास कर लेती हूँ और कर देती सारी शिकायतें खूब झगड़ कर हल्का कर लेती हूँ ख़ुद को यूँ ही क्योंकि नहीं कह पाऊंगी कभी तुमसे ग़लत को भी ग़लत बस इतना कहूंगी कि होनी चाहिये परख तुम्हें सच और झूठ की असल और नक़ल की सही और ग़लत की भी ! ! असीम
Image
गतांक से आगे ॥ कहाँ खो गयी मेरे लब की हंसी कि आज दिल उदास है बहुत !! यह रात का दूसरा पहर जब खत्म होने को है तब मैं अपनी नींद से बोझिल आँखों के साथ लिखने को मजबूर हूँ क्योंकि अगर अभी मैंने नहीं लिखा तो मेरे प्राण जो अधर में लटक गए हैं आकर और मेरे दिल की बेचैन धड़कने मुझसे इतने सवाल कर रही हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है ? उन्हें चैन नहीं मिलेगा ,,,,वैसे चैन सकूँ तो सब उस दिन ही खो दिया जिस दिन मुझे प्रेम हुआ ....मेरे प्रिय तुम ऐसा क्यों करते हो ?आखिर क्यों? क्या तुम जानते हो ? क्या तुम्हें पता है कि मेरी एक एक स्वांस तुम्हारा नाम लेती है हर पल में सिर्फ तुम्हें ही जीती है,,, क्या तुम मेरे अन्तर्मन में बसे मेरे  पवित्र  प्रेम को मिटा सकते हो ? क्या मेरी महकती स्वांसों की खुशबू तुम चुरा सकते हो ? बोलो प्रिय क्या तुम नहीं समझते कि मेरा प्रेम एक ताजी हवा के झोंके की तरह शीतल है, जो खुद ही सुलझा लेती है अपनी सारी उलझने, कितने भी दर्द या दुख हो उन्हें अकेले ही निभा लेती है, सह लेती सारी तकलीफ़ें अकेले ही, ताकि तुम्हें दे सके अपना निश्छल प्रेम,, मेरे प्रिय जब ट्रेन चलती है तब स...
Image
गतांक से आगे    तुम्हारा आना यूं रोशनी का बिखर जाना     बेवजह भी अब लब मुस्कराने लगे हैं !! सुनो प्रिय          इस तरह से आ गए हो मेरी जिंदगी में जैसे चाँद, सूरज, सितारे, हवाएँ, आकाश और सम्पूर्ण प्रकृति की तरह से ,,,तुम्हारा होना ही बहुत है प्रिय चाहें पास रहो, दूर रहो लेकिन हो इतने करीब जैसे मेरे दिल की धड़कन ,,,जैसे सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड मेरी बाहों में ,,,,तुम जितना दूर जाने की कोशिश मात्र भी करते हो उतना ही और करीब आते चले जाते हो ,,,,इतना कि मैं महसूस करती हूँ तुम्हारी खुशबू , तुम्हारी स्वांसे , तुम्हारी धड़कन ,,तुम समझते हो न प्रिय कि यह मेरा प्रेम आज से नहीं सदियों से है जन्म जनमान्तरों से तभी तो कितनी अड़चनों के बाद भी ये निरंतर गहन होता चला जाता है और भी ज्यादा गहरा ,,,,पक्के रंग पर एक और पक्की परत चढ़ती चली जाती है ,,,,आज का कल का या एकाध जन्म के प्रेम का फल नहीं है प्रिय, यह तो सदियों की तपस्या का प्रतिफल है जो अब प्रकट हो गया है ,,,,,तुम जानते हो न मेरे लिए दुनियाँ की सारी खुशियाँ ,, सारे सुख ,,सारे साम्राज्य...
Image
गतांक से आगे रिया मुस्करा सुनो प्रिय  दिल में तेज दर्द है और आँखों में नमी है ! जिस्म बेजान सा होने लगा है !!  हमें अहसास ही नहीं हुआ और हम दोनों हाथों में हाथ डाले कितनी दूर तक निकल आए ,,,वहाँ तक, जहां से आगे न कोई मोड है, न कोई दोराहा या चौराहा,, बस एक सीधी सी पगडंडी जिसपर चलते हुए सिर्फ आगे बढा जा सकता है .....सुनो मेरे प्रिय जब तुम थक जाओ तो मुझे बता देना या जब मैं थक जाऊँगी तो तुम्हें क्योंकि हमें रुकना नहीं है, ठहरना भी नहीं है, बस चलना है और चलते ही चले जाना है एक दूसरे का सहारा बने हुए ,,,,, मुझे पता है और तुम्हें भी कि यह रास्ता इतना आसान नहीं है ,,बहुत सकरी सी, पथरीली, ऊँची नीची है यह पगडंडी ,,जहां से हम दोनों को बहुत संभल संभल के निकलना है नहीं तो बहुत मुश्किल हो जाएगा ,, तो प्रिय मेरे हाथ को थामे तुम और तुम्हारे हाथ को थामे मैं चलते चले जाएँ दुनियाँ की किसी भी बात से बेपरवाह होकर ,,,,मेरे खुले गेसूओं में उलझते सुलझते तुम भूल जाओ सारी थकान ,,चाँदनी से धुला संवरा हमारा मन, हमारा पवित्र मन यूँ ही छुपाए रहे अपने अन्तर्मन में अपने सच्चे प्रेम को ,,, मैं ने...
Image
नज़्म   उलझती हैं लटें जो चेहरे पे बिखर कर सुलझाने की दिल में न तमन्ना कोई छुपे छुपे हैं आँखों में जो सुहाने सपने हैं राहें भी अपनी और दिन भी अपने न तुमने भुलाया न हमने भुलाया यह मंजिल अपने साथ ही साथ है   मिल गए यूं ही अचानक से ही तुम जान आयी जिस्म में रूह को सकूँ     पढ़ ली आँखें मेरी सुने शिकवे गिले   कोई तो बात है जो नम आँख तेरी   रख लिया सीने   पर सिर   मुस्कुराए लब   बार बार नजर चुरा के देखा फिर मुझे   जुड़ गये तार   वीणा   के बजी     रागिनी     धड़का जो दिल मिल के एक राग में !! सीमा असीम
Image
गतांक से आगे रिया मुस्करा बात बस से निकल चली है दिल की हालत संभल चली है अब जूनून हद से बढ़ चला है अब तबियत बेहाल हो चली है सुनो प्रिय ,,जब तुम जाने की बात भर भी करते हो न, तो न जाने क्यों मेरी आँखों से अश्क बहने लगते हैं न चाहते हुए भी... प्रिय मैं सब जानती हूँ सब समझती हूँ कि हूँ मैं संग हूँ तुम्हारे सदा, फिर भी न जाने क्यों इस दिल की मासूमियत भरी जिद को कैसे समझाया जाये, कैसे मनाया जाये , कैसे बहलाया जाये ,, ,,,,कोशिश करती हूँ और इसे समझा भी लेती हूँ लेकिन पल भर को जान निकल जाती है यूं जैसे जिस्म में जान बची ही नहीं है ,,बेजान सा ,बेहाल सा ,,क्या तुम्हें पता है यह जिंदगी चंद लम्हों की ही तो है ,,,पल भर में दिन गुजर जाएगा ,,रात ढल जाएगी,,क्या मालूम कब तरसना ,तड़पना , मचलना ,सब खत्म हो जाये , बिसर जाये ,भूल जाये ,,,उससे पहले ही मैं रख कर तुम्हारे कंधे पर अपना सर और डाल कर गलबहियाँ घूम लें पूरा ब्रह्मांड ,,चक्कर काट लें पूरी धरती का और छोड़ दे अपने कदमों की छाप,,, यूं ही हम हाथों में  हाथ डाले ...... तो प्रिय आओ बैठ जाओ मेरे पहलू में कुछ देर को और तुम बोलते...
Image
गतांक से आगे  रिया मुस्करा आ बैठ मेरे पास तुझे देखती रहूँ  न तू कुछ कहे न मैं कुछ कहे  हाँ प्रिय बस ऐसे ही मेरे सामने बैठे रहो बिना कुछ बोले बिना कुछ सुने,,, यूं ही बिना पलके झपकाए तुम्हें देखती रहूँ, न कोई सवाल, न कोई जवाब ,,,बस न कोई शिकवा, न कोई शिकायत, न यह बताऊँ कि कैसे बिताए दिन या कैसे रही इतने दिन तुम्हारे बिन ? कब कब आए तुम ख्वाबों में ? किस रात सोई और कौन सी रात यूं ही गुजर गयी आँखों में ,,, अपने लबों को सी कर देखती रहूँ तुम्हारी आँखों में और बसा कर एक बार उतार लूँ इस तरह से दिल में कि तुम भटक ही नहीं पाओ ,,जमाने की कोई तकलीफ से तुम्हारा सामना ही न हो ,,,,मेरे प्रियतम मैं अपनी पलकें झपका लूँ ,,,समा जाऊँ तुम्हारी बाहों के घेरे में और घेर लूँ तुम्हें अपनी बाहों में ,,,,न जीतने की परवाह हो, न हारने की, न रीत जाने की ,,,और बस इसी तरह अपने एक एक शब्द में तुम्हें रचती रहूँ ,,,और जलाये रहूँ अपने मन का दीपक, दुनियाँ की, जमाने की आंधियों की परवाह किए बगैर ,,,, क्या तुम्हें पता है ? तुम जानते हो कि प्रिय के साथ होने का अहसास भर ही चेहरे की चमक और आँखों की ...
Image
गतांक से आगे मन में न जाने कैसी हलचल सी है  न जाने यह कैसी सिहरन सी है रोम रोम में  न जाने कैसी घुटन सी  न जाने कैसी बेचैनी  ये कैसी उथल पुथल सी मची हुई है  जी चाहता है अपनी बाँहें फैलाऊँ और तुम्हें छु लूँ, भर लूँ अपनी बाँहों में और चूम लूँ तुम्हें ,प्रिय कि तुम्हारी याद आई , जी चाहता है इस तरह से सहेज लूँ तुम्हें कि कोई बुरी बला तुम्हारा बुरा न कर सके , प्रिय आ जाओ कि बाँहें फैला कर मैं तुम्हें पुकार रही हूँ,,,प्रिय तुम  ही मेरी तकदीर हो और तुम्हारी मैं क्योंकि अलग नहीं है हमारी किस्मत वो अब साझी हो गयी है ,,,हाँ भरोसा है मुझे पूरा कि तुम हो मेरे ,,,मैं गाती रहूँगी,,,गुनगुनाती रहूँगी और तुम्हें यूं ही पुकारती रहूँगी क्योंकि आजकल मेरे मन में न जाने कैसी बेचैनी सी जाग गयी है जो मुझे पल भर का भी चैन ही नहीं लेने देती ,,,,मैं सुन रही हूँ ,,महसूस कर रही हूँ ,,,अहसासों में भर रही हूँ कि वो ऊंची पहड़िया ,,झरने ,मेरे स्वर में स्वर मिला रहे हैं ,,,मैं अपने प्रेम के उद्वेग में भरी न जाने क्या क्या कहे जाती हूँ ,,प्रिय ये मेरा प्रणय जो तुम्हें पुकारत...
Image
गतांक से आगे मैं कभी कभी यह सोचकर बहुत परेशान होती हूँ कि आखिर आज का इंसान क्या चाहता है ? वो क्यों इतनी ललसायेँ पाल लेता है ? क्यों भूल जाता है कि यह तन तो माटी का है और माटी में ही मिल जाएगा ,,,, हमारे साथ अक्सर गलत क्यों होता है ? जो सब कुछ बिना किसी शिकवा शिकायत के सहन कर लेता है उसे ही क्यों रोना पड़ता है? किसी को प्रेम करना गलत है ? किसी के साथ वफा निभाना सही नहीं है ? आखिर बेवफाई क्यों करते हैं लोग ? क्यों नहीं समझ पाते कि प्रेम इश्क इतनी पवित्र और सच्ची भावनाएं हैं कि इनके साथ छल करना, धोखा देना गुनाह ही तो है ..... आज जब सब कुछ झूठ छल प्रपंच पर ही टिका है तो प्रेम की क्या बिसात कि वो ईमानदारी और सच पर ही टिका रहे >>>>  लेकिन मुझे यह  लगता है कि जब सच्चे प्रेम की शक्ति मन में होती है तो दुनियाँ की कोई ताकत हमें हरा नहीं सकती है बस यही सोचकर मैं प्रेम करती हूँ , मैं तुम्हें पाना नहीं चाहती , मैं तुमसे कुछ भी नहीं पाना चाहती , मैं नहीं चाहती कि तुम प्रतिकार में प्रेम दो ,,नहीं चाहती कि तुम वफा के बदले वफा दो ,,, नहीं चाहती कि तुम भी कोई दर्द सहो या ...
Image
  यूं गया है पूरा बरस  अप्रैल मई जून जुलाई  कितना तपाया  अगस्त सितंबर अक्टूबर नबमबर  शरद चाँदनी ने रुलाया  हिचकी सिसकी  अन्तर्मन में कितना कुछ टूटा फूटा  मन का पंछी  अंबर कभी धरती  कितना तड़पाया  आँखें टिकी रही रास्ते पर  निहारती रही  पल पल  देखो कितनी धुंधली हुई रोशनी  इतना पथ को  नैनों से बुहारा  समझों पूरा बरस गया  देखो वे देव हमारे इंतजार में बैठे हैं  हमारी राह ताकते  अपना सर उन्न्त किए  क्या तुम्हें भान नहीं है प्रिय  बर्फ से अटे पेड़ पौधे  सर्द रातों में ठंड से ठिठुरने वाले हैं  बूंद बूंद टपकती ओस की बूंदें  मानों बहा रही हैं आँसू  हमारे इंतजार में  कोई गौरैया चहचहा कर  भेज रही है निमंत्रण स्वागत में बिछे फूल  महका रहे हैं वादियों को  प्रिय उन फूलों के मुरझाने से पहले  उन चिड़ियों के जाने पहले  पर्वतों के आमंत्रण का मान रखना  हरे पेड़ों का हरापन बरकरार रखना  कह रहा है...
Image
गतांक से आगे  रिया मुस्करा चाँद को तकते तुम्हें याद करते दीदार की दुआ मांग लेती हूँ  सुनो प्रिय,           कभी कभी तुम्हें याद करते हुए तुम्हारा नाम लेते हुए न जाने क्यों दिल सा घबराने लगता है एक एक शब्द को फिर मैं हल्के हल्के से लेती हूँ लेकिन दिल चाहता है कि मैं ज़ोर से आवाज लगाऊँ इतनी ज़ोर से कि पूरा जहां उस आवाज से गूंज जाये पर न जाने कैसे वो आवाज घुट सी जाती है मेरे भीतर ही कहीं और मन के अंदर मच जाता है हाहाकार सा ,,,क्यों प्रिय ऐसा क्यों होता है      क्यों नहीं सुन पते तुम मेरी आवाज मेरे बिना ज़ोर से लगाए ही ,,क्यों नहीं देख पाते मेरे मन की पीड़ा , बिना देखे ही ,,,क्यों नहीं पढ़ पाते मेरी आँखों का इंतजार ,,क्यों प्रिय ?? क्या सच को भी किसी गवाही की जरूरत होती है,मेरे प्रिय मेरी आँखों की नमी मेरे छलक़ते हुए अश्क झूठे नहीं हैं,मेरे मन में ख़्वाहिशों उम्मीदों का सिर्फ एक ही सच है सिर्फ एक ही, क्या तुम समझते हो प्रिय ? क्या तुम्हें पता है?क्या तुम जानते हो ? अगर हाँ ,,,तो फिर क्यों तकलीफ ,,...
Image
मैं चाहती हूँ पूरे मनोयोग से   अपनी भावनाओं की पराकाष्ठा तक  मैं तुम्हारे लिए अपनी श्रद्धा आस्था के साथ समर्पित हूँ  मुझे अहसास हो रहा है  मैं महसूस कर रही हूँ  मेरे मन में कुछ हो रहा है  मानों स्वयम ईश्वर आकर नृत्य कर रहे हैं  जैसे सब शून्य में विलीन हो रहा है  अब लगा ले गले से मुझे इस तरह लगे न जीवित हूँ  न मरूँ कभी  जज़्ब हो जाऊँ  मुक्त हो जाऊँ और हो जाये अमर  हमारी मोहब्बत  हमारी मोहब्बत  सदा के लिए  सदा सदा के लिए !! सीमा असीम
गतांक से आगे रिया मुस्करा नूर बरसता है सच पर  बस इतना यकीन है !! सुनो प्रिय  जो तूम एक शब्द भर लिख  देते हो, या जो तुम एक शब्द भर कह देते हो, उसे पढ़ते  हुए, सुनते हुए, गुजर जाती है सारी रात यूं ही तुम्हें  याद  करते हुए, महसूस करते हुए, अहसासों में भरते हुए ...क्या तुम ऐसे ही हो या तुम जान बुझ कर ऐसे बनते हो, करते हो, प्रिय सुनो प्रेम किया तो अहम कैसा, क्यों और किसलिए ...कभी तो सोचा होता या महसूस किया होता या अहसासों में भरा होता ..... प्रिय रात भर यूं ही पिघलती रहती हूँ, तपती हूँ या जलती हूँ या यूं कि कहीं दूर से आती रहती है आवाज जिसे सुनते हुए गुजर जाती है पूरी रात ,,,, चाँद आया चमका या ओट ले ली चाँदनी की पता नहीं कोई फर्क ही नहीं पड़ता .....बस दिल में चराग सा जलता रहता है जो अहसास दिलाता है कि जीवित हूँ अभी खुद ही खुद के अहसासों में ...दिल कभी रूठ जाता है और कभी मना लेता है याद दिला जाता है कि प्रीत है निर्मोही से .... सुबह की पहली किरण के निकलने से पहले बोझिल आँखें बंद होने लगती हैं लेकिन उन बंद आँखों में एक छवि होती है जो ख्वाबों में आ जाती ह...
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है वो शाम कुछ अजीब थी... झुकी हुई निगाह में कहीं मेरा ख़याल था दबी-दबी हँसी में इक हसीन सा गुलाल था मैं सोचता था मेरा नाम गुनगुना रही है वो न जाने क्यों लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो वो शाम कुछ अजीब थी... मेरा ख़याल है अभी झुकी हुई निगाह में खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में मैं जानता हूँ मेरा नाम गुनगुना रही है वो यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो वो शाम कुछ अजीब थी...
Image
दूर तक खामोशियों के संग बहा जाए  बैठकर तनहाई में खुद को सुना जाये  देर तक सोचते हुए आया मुझे ख्याल  आइनों के सामने खुद पर भी हंसा जाये  जिस्म के पिजरे का पंक्षी सोचता रहता है ये  आसमा में पंख फैला कर भी उड़ा जाये  उम्र भर के इस सफर में बार बार चाहा तो था  अनकहा जो रह गया वो भी कहा जाये  खुद की खुशबू में सिमट कर उम्र सारी काट ली  कुछ दिनों तो दूर खुद से भी रहा जाये !!
Image
गतांक से आगे रिया मुस्करा महकने लगे हैं फ़स्ल-ए-गुल, गुलशन आबाद है ! कि सुब्हे-सुख़न आएगी , शाम-ए-नज़र आएगी !! सुनो प्रिय            मेरा मन जो तुमसे कहता रहता है, सुनता रहता है, पूछता रहता है, बताता रहता है और शायद तुम्हारा मन सब सुनता है, बताता है, समझता है लेकिन प्रिय हम अब रूबरू बातें करेंगे, हम साथ बेठेंगे, हम साथ मुस्कराएँगे, हम हँसेंगे खिलखिलायेंगे, अपने दर्द दिल का अब रूबरू बताएँगे, न जाने कितना रोयेंगे या सारे गम भूल जाएँगे ....हम अब अपनी किस्मत को मनाएंगे, हम मिल जाएँगे, हम फिर से मिल जाएँगे ... सुनो प्रिय यह जो मेरे लबों पर हल्की हल्की सी मुस्कान आ जाती है शायद तुम मुझे याद करते हो ...करते हो न ? कहते हैं दिल से दिल को राह होती है तो जब मैं सुबह से लेकर अगली सुबह होने तक किसी दीवानी की तरह से तुम्हारा नाम रटती हूँ ,,पल पल में ज़ोर से आवाज देकर पुकारती हूँ न ...जरूर मेरी आवाजें आप तक पहुँचती होंगी ,,  प्रिय तुम जानते हो न कि हम हमेशा आपके साथ हैं, हमारे हाथों में हाथ हैं ...जमाने की लाख तकलीफ़ें सहकर भी यूं ही साथ निभाएंगे और हाथों...
Image
गतांक से आगे रिया मुस्करा छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके, नैना मिलायके सुनो प्रिय,               मैं सोचती हूँ , विचारती हूँ , याद करती हूँ , कि हमने मिलकर बुनी एक खूबसूरत सी चादर जिसे सजाया सुंदर सी रंग बिरंगी रंगों से सजी फुलकारी से ... ओढ़कर उसे खो जाते थे मनोहारी ख़यालों में ...हरपल में मैं उसे प्यार से सजाती सवांरती निहारती ॥कितनी चमक, कितनी खुशी आँखों से झरती रहती हमारी आँखों से ,,,कि न जाने कहाँ से भर गयी आँखों में ढेर सारी नमी, उदासी, दर्द, तकलीफ, जुदाई , विरह , तड़प इंतजार ॥सुनो मेरे रांझना आखिर क्यों ? हमने तो अपना सारा समय, तुम्हें ही समर्पित कर दिया ,,,दूर हो पास रहो फिर भीअपने पल पल में तुम्हें बसा लिया तो हमें तनहाई क्यों मिल गयी ? क्यों मिली ये सजा ? क्यों ???.... मेरे प्रिय मुझे फिर से जीना है, फिर से मिलना है, यही दुहाई मेरा दिल बार बार करता है ,,,,, न जाने कैसे यह दर्द से रिश्ता बन गया है ...न जाने कैसे लोग यह जुदाइयाँ सह पाते होंगे ...न जाने कैसे जी पाते होंगे ???? खुद से ही बेगानी होती जा रही हूँ कहीं खोती जा रही ...
Image
इश्क का रंग सफ़ेद पिया  न छल न कपट न भेद पिया  सौ रंग मिले तू एक वरगा  आतिश होया रेत पिया रेत पिया  सुनो प्रिय               तुम क्या सब समझते हो ? तुम क्या सब जानते हो ? क्या तुमने कभी महसूस किया ? क्या तुम्हें कभी अहसास हुआ ? क्या कभी तुमने उस दर्द को महसूस किया ? क्या कभी तुम्हें अनुभुति भी हुई है ?  प्रिय तुम दिन पर दिन मेरे प्रेम के कर्जदार होते जा रहे हो ... कैसे चुका पाओगे तुम मेरा कर्ज ? सोचकर कभी कभी उदास सा हो जाती हूँ.... सुनो मेरे प्रियतम जब मैं तुम्हें दिल से पुकारती हूँ तब तुम्हारे दिल तक तो मेरी आवाज जरूर ही पहुँचती होगी फिर तुम इस तरह का व्यवहार क्यों करते हो जैसे तुम कुछ अनुभूत ही नहीं कर रहे ,,,,अब तुम्हारे सुख तुम्हारे दुख सिर्फ तुम्हारे थोड़े ही न हैं वे तो हमारे हैं हमारे साझे हैं ,,गम खुशियाँ  प्रिय  क्या तुम जानते हो क्या तुम्हें पता है कि जब रात आतीं है तो रात नहीं आती जब दिन निकलता है तो दिन नहीं निकलता ,,,सूर्य के उगने से रोशनी नहीं बिखरती या चाँद के आसमा...