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Showing posts from January, 2020
फिर से कलियां मुस्कुरा कर खिली  है डालियाँ झुकी झुकी जा रही हैं सुनो प्रिय, आज मेरा दिल बार बार तुम्हें पुकार रहा है , ना जाने क्यों मन नहीं मान रहा है और जी रहा है एक बार तुमसे बात करूँ बस बात ही हो जाये तो मन बहल जायेगा और दिल जो तुम्हें पुकारे जा रहा है इसे थोड़ा सकूँ आ जायेगा ,,, मुझे लगता है यह तुम्हारे दिल की आवाज है जो मेरे दिल से निकल रही है ,, क्या तुम चाहते हो मुझसे कुछ कहना या सुनना , अगर हाँ तो करो न मुझसे कोई बात , बता दो वो सब बातें जो तुम्हें उदास करती हैं , तुम्हें निराश करती है और तुम्हारा दिल दुखा देती हैं तो कहो न मुझसे बोलो न कुछ , सब दुख खुशियों में बादल जाएँ ! करो मुझसे कोई बात कि आज दिल पुकारता है तुम्हें ... सीमा असीम  30,1,20 
रोते रोते थक चुकी थी आँखें अब मुसकुराना चाहती थी आँख बस छलक़ने ही वाली थी कि तुम सामने आ गए सनम ... दिल इतना तेज तो कभी नहीं धड़का था ,,आज ऐसा अहसास हुआ मानों कितने दिनों के बाद दिल में प्यार की उमंगें हिलोरे ले रही थी ,, मन मुस्कुरा उठा ,,जीने का मन करने लगा ,, सनम मैंने तो सोचा नहीं था कि मेरा प्रेम फिर से तुम्हारे मन में हरिया जायेगा और पहले से ज्यादा प्रेम उमड़ पड़ेगा और  मैं नाचने गाने को मजबूर हो जाऊँगी ,,सच है यही, तुम आ गए मेरे लिए प्रेम का सागर के लेकर मुझे उस में और भी ज्यादा गहरे तक डुबाने के लिए ,,,, तारो की भीड़ में जैसे एक अकेला चाँद होता है नवैसे ही हो तुम काली अंधेरी सर्द रात में जबकभीकोहरे को चीरतेहुएचाँद  आ जाता है न ,  मेरे प्रिय तो तुम हीलगते हो मुझे मेरे अपनेप्यारे चाँद और मैं उदास सर्द रात में भीजी खोल करमुस्कुरा उठतीहूँ कि तेरा होनाभर ही मेरेजीवन में ऊर्जा का संचार कर देता है ...सीमा असीम ,29,1,20 
तुम मेरे हो यह ख्याल भर नहीं  हो सिर्फ मेरे यही सच है  मेरे  नितांत अकेले पलों  में , मैं नहीं होती हूँ अकेली ,तुम होते हो मेरे साथ कभी उदासी बनकर आ जाते हो और कभी आँखों में आँसू बनकर बहने लगते हो , मैं याद करती हूँ तुम्हें अपने हर पल में कि तुम ही हो मेरे सब कुछ और कोई नहीं , कोई भी नहीं, कभी भी नहीं,जब  आधी रात को  एक दिन विदा लेता है  और दूसरा दिन शुरू हो जाता है,तब मैं  याद करती नहीं हूँ बल्कि तुम  याद आते  हो   जैसे कोई मंदिर का दीपक जल जाए चुपचाप ऐसे तुम आकर समा जाते हो मुझमें मैं  स्तब्ध हो तुम्हें निहारती रह जाती हूँ लेकिन तुम नजर नहीं आते तुम मेरे मन में बसे रहते हो ,, तुम मेरा कोई ख्याल भर नहीं हो तुम सच हो और मुझमें बसते हो अलग नहीं हो मुझसे , पल भर को भी अलग नहीं हो ,, कहते सुनते रहते हो अपने सुख दुख मुझसे और मेरे बहते हुए आंसुओं को अपने हाथों  से पोंछ देते हो प्रिय सुनो तुम जाओ कहीं भी हो मेरे ही सिर्फ मेरे ही और रहोगे मेरे जन्मों तक ,,,  क्योंकि मैं तुम्हें चाहती हूँ और तुम मुझे लेकिन मैं कु...
प्रेम भरे उस स्पर्श की स्मृति ,, जब जब  स्पर्श किया तुमने मुझे,, याद आता है मुझे ,,  तुम्हारा वो पहला स्पर्श मेरे रोम रोम को पुलकित कर रहा है कि वह पहला स्पर्श मेरे जीवन का सच में पहला स्पर्श था जिसे मेरे मन ने पहली बार महसूस किया ! क्या  तुम्हें पता था कि वो  स्पर्श अपूर्व था, अनुपम था , अमूल्य था !  उस स्पर्श की स्मृति से  ही मेरे सारे तन मन में अनोखी खुशी का संचार होने लगता है ,, गाने लगता है मन और तन नृत्य कर उठता है ..... क्या तुम्हें पता है कि तुम ही मेरा पहला प्यार हो जिसे मैंने अपने सच्चे मन से स्वीकार किया और जिया ! मुझे याद आते हैं फिर वे तुम्हारे स्पर्श जो हमेशा पहले  स्पर्श जैसा ही  सुख देते हैं लेकिन कभी मैं उदास होती  हूँ तब चाहती हूँ कि वही सुखद स्पर्श मुझे दे दो आकर और मैं अपनी नाराजगी भूल जाऊँ .....फिर मैं पुकारती हूँ तुम्हें कि आओ और आकर मेरे गले लग जाओ, मेरे तड़पते दिल को सकूँ दे जाओ .... रात के दूसरे प्रहार में जब मुझे नींद नहीं आ रही होती है तब मैं लिखती हूँ तुम्हें , अपनी  स्मृतियों में बसाये डूबती चली जाती हूँ ......
अय मेरे दिल मत घबरा मत हो उदास कि दुनिया की हर शय घबरा उठे ... हे मेरे ईश्वर                मैं नहीं समझ पाती कभी कि आखिर मेरी गलती क्या थी , या सजा किस लिए मिली , मैं सच हूँ न एकदम सच , क्या तुम नहीं जानते , तुम तो समझते हो मेरे मन की एक एक बात , मैं अपने तन मन और अपनी अंतरात्मा से पूरी तरह पवित्र हूँ फिर क्यों इतना दर्द , क्यों इतने दुख , क्यों इतने आँसू , क्यों इतनी तकलीफ , बताओ बोलो मेरे ईश्वर मुझे मेरे सवालों के जवाब दो , चाहिए मुझे जवाब , हाँ नहीं तो मैं मर जाऊँगी तब भी मुक्त नहीं हो पाऊँगी तड़पती रहूँगी ,आत्मा को भी कभी मुक्ति नहीं मिलेगी,,, ,कभी नहीं मिलेगी , यूं ही रोएगी जैसे आज रोती है ,, तड़पती है , मचलती और खुद को और भी ज्यादा तकलीफ देना चाहती है , और भी ज्यादा रोना चाहती है , खत्म लेना चाहती है ,, बस चाहती है तुम्हारी खुशी ,,, मेरे प्रिय ईश्वर  सुनो तुम खुश तो हो न ,, मैं चाहती हूँ तुम खुश रहो , मुसकुराते रहो , हाँ मैं ईश्वर नहीं हूँ लेकिन दुआ दे सकती हूँ मैं जानती हूँ कि मेरा सच्चा मन कभी किसी को कोई भी दुख नहीं देना चाहता ,,बिल...
अय मेरे दिल मुस्कुरा तू इतनी ज़ोर से कि सारी घबराहट दूर हो जाये ... हे मेरे ईश्वर,  जब दिल बुरी तरह घबरा जाता है ,घुटन से भर जाता है तो बस मन दो बातें ही चाहता है या तो खत्म हो जाये इस  दुनिया से झूठ या फिर  सच का कभी कोई दिल ना दुखाए ,,,कि दुखता है जब दिल तो आँसू बहते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी थमते नहीं हैं , बेजान सा जिस्म हर कार्य  को करने से इंकार कर देता है .....न जाने क्यों उलझता है मन और फिर लाख कोशिश करो सुलझता नहीं है क्योंकि मन से उठने वाले सवालों के जवाब खुद ही मन को देने होते हैं और वे सही हैं या गलत हम सिर्फ अहसास के सहारे ही निर्णय कर पाते हैं और हम नहीं चाहते कि मेरी बजह से किसी का जरा भी दिल दुखे या उसे कोई तकलीफ हो इसलिए हम अकेले ही सारे गम सारे दर्द सहते हैं , रोते हैं चीखते हैं चिल्लाते हैं और खुद को ही घायल कर लेते हैं ,,,,जख्मी होकर तड़पते हैं लहूलुहान कर लेते हैं और फिर उन जख्मों से टपकता है लहू , बहता है लाल सुर्ख खून ,,,, दीवानेपन की सारी हदें पार करके उसके चरम का स्पर्श का लेती हैं और हो जाती हैं दर्द की इंतिहां पार ,,,, फिर रो...
अति सर्वत्र वर्जयेत   हे मूर्ख इंसान इतनी अति मत फांक कि  धरती आसमान डोल जाये और खुल जाये भोले बाबा का तीसरा नेत्र , डर तू अपने कर्मों से, डर तू लोगो को सताने से, मूर्ख बना कर दुनिया को खुद को होशियार समझता है ...प्रकृति को नष्ट करके नोच खरोच और नुकसान करके खुद आगे बढ्न चाहता है ... बोल हे मूर्ख इंसान आखिर तू इस दुनिया से क्या चाहता है कितना लूटना चाहता है , कितना इकट्ठा करना चाहता है , आखिर तू क्यों है इतना कुटिल और छल वल से भरा हुआ, क्या तुझे समझ नहीं आता आज तू विनाश कर रहा है एक दिन तेरा विनाश हो जाएगा , टूट पड़ेगा तुझ पर ही प्रकृति का कहर , तब तू पछताएगा , दर्द से बिलबिला जायेगा , नहीं आएगा तुझ पर किसी का रहम ,न तू चैन की सांस ले पाएगा , घुट जायेगा तेरा भी दम , ओ मूर्ख मानव क्या तू अभी भी नहीं सुधरेगा , कितना और लूटेगा , कितना और बर्बाद करेगा ,  संभल जा अभी भी वक्त है कि अब प्रकृति घबरा उठी है और त्राहि त्राहि करने लगी है ,,,, 24,1,20 
जब आँखों से बहती है मेरे मुस्कान तब तुम रो देते हो मेरे सनम मेरा सच्चा विश्वास हो तुम और मैं तुम्हारी सच्ची श्रद्धा मैं जानती हूँ कि जब कभी मेरी आँखों से आँसू झर रहे होते हैं तब वो प्रेम होता है मेरा , इस कदर भर जाता है प्रेम मुझमें कि बहने लगता है और फिर थमता नहीं है इतना प्रेम जो तुम मुझ पर लुटाते हो, मेरे गम में जब आँसू बहाते हो, विरहा की अगन में जल जाते हो, तो पुकारने लगते हो मुझे और मैं सब बिसरा कर तुम्हारे पास दौड़ी चली आती हूँ ,, तुम मुझे जब हिलक कर गले से लगाते हो और खुशी से मुस्कुरा देते हो, तो होने लगती है आसमा से फूलों की बरसा ,,देवता मंगलगीत गा उठते हैं, हवाएँ कोमल होकर बहने लगती हैं, संसार के सारे दुख खुशी में बादल जाते हैं और मन हल्का हो कर नृत्य करने लगता है ...हे मेरे ईश्वर मैं सच हूँ और सरल भी, बस मेरी यह सरलता और सच्चाई यूं ही बनी रहे ... बना रहे यह प्यारा जग और खुशबू महकती रहे ,,,, मैं देती जाऊँ खुशियाँ और खुशियों में डोलती रहूँ कि मेरे सच्चे विश्वास को हिलाने की ताकत किसी में कैसे हो सकती है कोई भी शक्ति मेरे विश्वास को डिगा नहीं सकती है कभी भी नहीं न इस जन्म न ...
क्या कहूँ मैं खुद को क्या न कहूँ अब ॥ अपनी मूर्खता पर ज़ोर से हंसने का मन कर रहा है लेकिन मैं तो रो रही हूँ, चीख रही हूँ और खुद को ही चोट पहुंचा रही लेकिन यह जो चोटें मैं खुद को दे रही हूँ इन चोटों का भयंकर दर्द भी मेरी उस चोट को संभाल नहीं पा रहा है मरहम नहीं लगा पा रहा है जो मेरे दिल पर लग रही है और बार बार उस चोट को ही और गहरी चोट पहुंचा रहा है ,,,,मानों यह जिस्म घायल पंछी बन गया है और बेबस होकर तड़प रहा है ,,,आह, निकल कर उड़ पाता यह पंछी , आह, किसी तरह तो मिलती दिल को राहत, आह, कुछ पल तो जी लेती मैं चैन से ... हे मेरे ईश्वर मुझे शक्ति दो मेरे कमजोर मन को इतना ज्यादा कमजोर मत बनाओ जिससे जीने की हर उम्मीद मैं अपने ही हाथो खत्म कर दूँ और फिर यह दुनिया अपनी रफ्तार से यूं ही चलती रहे ,,, क्या मैं इसलिए इतनी कमजोर पड रही हूँ कि मैं सच हूँ अगर हाँ तो मैं ऐसे ही बनी रहूँगी कोई कितना मुझे मजबूर करेगा और मुझे यूं ही सताता रहेगा ...समझ नहीं आता है कैसे मैं अपने दुख को लिख सकूँगी , कैसे अपने आंसुओं को संभाल सकूँगी , नहीं संभाल रहा कुछ भी ,,, नहीं समझ आ रहा कुछ भी ... इस बेईंतिहा कष्ट से कैसे ...
मेरे बिव्हल मन में तुम्हारी याद रहती है कि मैं बेमन की हो गयी हूँ इनदिनों सुनो हे मेरे ईश्वर  चाहती हूँ मैं कि सोचूँ खुद को लेकिन मैं सोचने लगती हूँ तुम्हें, कितना चाहती हूँ देखूँ आईने में खुद को लेकिन देखने लगती हूँ तुम्हें , मैं चाहती हूँ जी लूँ कुछ पल खुद के लिए लेकिन जीती रहती हूँ तुम्हें सिर्फ तुम्हें ,,,हाँ मेरे प्रिय तुम शायद मेरे मन के भाव जानते और समझते हो तभी आकर बैठ गए हो खुद ही मेरे मन में धूनी रमाकर तभी तो तुम्हारे सिवाय मेरे मन न कोई भाता है न कोई टिकता है ,लेकिन एक बात समझ नहीं आती है कि जब मेरे मन में तुम बसे हो तो मेरी आँखों में आँसू क्यों भरे हैं , क्यों मन भारी होता है और गहरी उदासी आ जाती है क्या तुम परेशान हो या किसी तकलीफ में जो मैं यहा दुखी हो जाती हूँ पता है तुम्हें मैं खुद को बहलाने समझाने का कितना काम करती हूँ जिससे तुम पर इस दुख दर्द और तकलीफ की कोई छाया न पड़े ! मुस्कुरा अय मेरी जिंदगी कि मेरा सनम उदास न हो जाये ! सीमा असीम 21,1,20 
तू ही रे, तू ही रे तेरे बिना मैं कैसे जीऊँ ,,,, तुम हो तो है जिंदगी तुम बिन कुछ भी नहीं सुनो मैं जब दर्द से तड़प उठती हूँ तब मुझे सच्चे इंसान के कंधे की सख्त जरूरत होती है कि मैं जी भर कर अपने आंसुओं को बहा सकूँ लेकिन मुझे कोई सच्चा शख्स दुनिया में नजर ही नहीं आता या तो मैं झूठी हो गयी हूँ , सच में मैं अपनी ही गलतियाँ ढूँढने लगती हूँ शायद मुझ में ही कोई कमी रह गयी होगी या मेरा ही प्रेम सच्चा नहीं होगा या मैंने कभी कोई गलत काम किया होगा ,,पर प्रिय जबसे मैंने तुम्हें अपना माना है किसी और को अपना समझा ही नहीं , न ही किसी को कभी कोई हक दिया कि कोई मुझे अपना कह सके या अपना मानने ही हिम्मत कर सके , मैं तो तेरी हो गयी हूँ सिर्फ तेरी और किसी की भी नहीं ! कोई चाहें दुनिया की सारी खुशियाँ हीरे पन्ने लाकर दे दे ,उसे कोई हक नहीं कि मुझे अपनी उंगली से भी छु सके सिर्फ यही एक सच है कि मैं तेरी हूँ सनम और तुम किसके हो और कितने सच्चे हो यह तुम्हारा मन जाने या तुम खुद स्वयम क्योंकि प्रिय हम सिर्फ अपने बारे में ही तो कोई राय बना सकते हैं या खुद को ही तो सच्चा और ईमानदार बना सकते हैं कोई कैसा है हम क्...
मेरा मन क्यों तुम्हें चाहें मेरा मन सुनो मैं तुम्हें अब कभी आवाज नहीं लगाना चाहती , अब मैं तुमसे कभी कुछ कहना नहीं चाहती , हाँ मैं नहीं चाहती कि मैं तुम्हें सब कुछ कह कर हल्की हो जाऊँ ,,क्यों कहें तुमसे अब हम अपने मन की कोई भी बात क्या तुम्हें नहीं लगता ,क्या तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आता ,क्या तुम्हें मेरी परवाह नहीं होती , कि मैं कैसे जी रही हूँ , मैं कितना याद कर रही हूँ , मैं पल भर को तुम्हें भुला नहीं पाती ख्यालों या ख्वाबों में तुम ही हो , कहीं भी हो ए लेकिन मेरे आसपास तुम्हारा ही डेरा है मेरे रोम रोम में तुम और मेरी नसों में लहू बनकर बहते हो फिर क्यों लगाए हम तुम्हें आवाज ,, क्या तुम्हारा फर्ज़ नहीं बनता कि मेरे बारे में जानो ,, मेरे प्रति तुम्हारे मन में भी फिक्र हो , मैं तकलीफ में हूँ तो आगे बढ़कर मेरा हाथ थाम लो और मुझे उबार लो हर दर्द और तकलीफ से , जब मैं रो रही होती हूँ तब आकर मेरे आँसू पोंछ दो और मुझे सब्र बंधा दो ! मैं बेजान हो जाती हूँ , निढाल सी कहीं पड़ी रहती हूँ तब मैं तुम्हारा  आसरा ताकती रहती हूँ लेकिन मैं हमेशा निराश हो जाती हूँ क्योंकि तुम स्वार्थी हो और अपने स्...
सब कुछ हमारे मन पर ही निर्भर करता है जब हम खुश होना चाहे हम खुश हो जाते हैं और दुखी होना चाहे दुखी हो जाते हैं लेकिन कभी हम अपने दुख के गुलाम होते हैं क्योंकि हम दूसरों पर खुद से ज्यादा ध्यान देने लगते हैं अपने आईने में अपने चेहरे को न देखकर सामने वाले का चेहरा देखते हैं जिसे हम खुद से ज्यादा तबज्जो देने लगते हैं बस तब हम खुद के भी नहीं रहते बल्कि उसके हो जाते हैं जिसे हम बहुत ज्यादा मान सम्मान देने लगते हैं उसके दुख में दुखी और सुख में सुखी होते हुए अपने जीवन को जान बूझ कर जकड़ लेते हैं , और उस जकड़ से बंधन से चाह कर भी छुट नहीं पाते भले ही सामने वाले को  कोई भी अंतर न पड़े !
यह तन और मन का कैसा अजीब सा रिश्ता है ,,जब मन अच्छा न हो तब तन भी कोई काम नहीं करना चाहता ,उदास होकर बैठा रहता है तन एक पोटली सा बनकर ,,,, कुछ भी करने का मन ही नहीं होता न तन साथ देता है बस आँखों से आँसू बहते रहते हैं और दुआ में हाथ उठ जाते हैं बार बार ,,,हे मेरे ईश्वर तुझसे कोई बात तो छिपी नहीं है न , तू तो सब जानता ही है , फिर मेरे मन को इतना कष्ट क्यों देता है ? क्यों मेरा मन दर्द के अथाह सागर में डूब जाता है जहां से कुछ नजर नहीं आता सिर्फ तुम ही तुम दिखते हो और कोई कोई भी नहीं , मुझे सच बताओ मुझे इतना दुख क्यों देते हो बताओ बोलो न ? क्या तुम्हें मेरा हँसना ,मुसकुराना ,मस्त रहना पसंद नहीं है ? क्या तुम नहीं चाहते मैं खुश होकर गुनगुना दूँ ? खिलखिला कर तुम्हें अपने गले से लगा लूँ फिर खूब देर तक हम हँसते रहे कोई गीत गाते रहे , जिसे सुनकर दुनिया भी मुस्कुरा पड़े , क्या तुम्हें मेरे खुश होने से दुख होता जो हर बात पर मेरा दिल दुखा देते हो बोलो बताओ मुझे ? जब मैं तुम्हारी खुशी के लिए निसार हूँ तो तुम क्यों मुझसे मेरी हंसी छीन कर गम भर देते हो मेरे दिल में , लेकिन एक बात तो तुमको ध्यान रखनी...
बंजारा  गर तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है ऐ ग़ाफ़िल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है क्या शक्कर मिसरी क़ंद गरी, क्या सांभर मीठा-खारी है क्या दाख मुनक़्क़ा सोंठ मिरच, क्या केसर लौंग सुपारी है सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा अर्थ  अगर तू लखपति है और तेरी दूकान में भरमार है ओ मूर्ख! (याद रख) के तुझ से भी बड़ा एक और व्यापारी है क्या तेरी शक्कर, मिश्री, गुड़ और मेवे, क्या तेरा मीठा और खारा आटा? क्या तेरे अंगूर, किशमिश, अदरक और मिर्च, क्या तेरा केसर, लौंग और सुपारी? जिस दिन बंजारे ने सामान लाद के चलने की ठान ली, तेरा सब ठाठ-बाठ बेकार पड़ा रह जाएगा
अपने दुख जाये जब मन दो अश्क छलका लेना न करना कभी शिकायत न कभी गिला करना तुम मेरे हो, हूँ तुम्हारी मैं फिर अपनों से क्यों अपने मन की कहना कि आता है उन्हें पढ्ना हर बात बिन कहे ही ! सीमा असीम 17,1,20
इत्ती सी हंसी इत्ती सी खुशी इत्ता सा टुकड़ा चाँद  का मुस्कुरा रहा है मेरा मन ,कितना बावरा ,दीवाना सा है मेरा मन कि पल भर में रो देता है पल भर में मुस्कुरा देता है ,क्या तुम भी मुस्कुरा रहे हो वहाँ पर जो मेरे लबों पर यहाँ महकते हुए फूलों की धूप सी खिल गयी है ,,कितना अच्छा लगता है यूं हँसते और मुस्स्कुराते हुए ! कभी खुशी में झूमना और कभी दर्द के अथाह सागर में हिलोरे लेते हुए डूबते चले जाना ! महसूस करो तब जानोगे और तुमसे क्या कहना तुम तो यूं भी महसूस कर लेते हो मेरे बिना कुछ कहे हुए और मेरी खामोशी को पढ़ते हुए ,,,हैं न ,,, सीमा असीम 16,1,20 
छलछल करके आंसुओं का छलकना मुझे अच्छा नही लागता  हर दम  मुझे उदास होना अच्छा नहीं लगता  बार तुम्हारे ख्यालों में खोना भी मुझे अच्छा नहीं लगता  हाँ प्रिय सनम मुझे रोना धोना बिल्कुल नापसंद है  फिर भी मैं अपनी आँसू भरी आँखों को  छलक़ने से रोक नहीं पाती हूँ  बहते हैं मेरे आँसू और  मैं किसी गहरी खामोशी में डूब जाती हूँ  कितनी अथाह गहराई है  उतरती चली जाती हूँ  गहरे गहरे और गहरे  जहां मेरा दम घुटने लगता है  घबराहट होने लगती है  मैं छटपटा उठती हूँ उबरने के लिए  तुम्हारा सहारा ढूँढने लगती हूँ कि तुम हाथ बढ़ाकर मुझे उबार लो  मैं स्वांस ले सकूँ  मैं दर्द से राहत पा  सकूँ  रखकर तुम्हारे कंधे पर अपना सर  कुछ अपने मन का बोझ उतार सकूँ  हाँ देखो न कितना भारी भारी है मेरा मन  तभी तो छलक पड़ता है बार बार  तुम भी तो यूं ही करते हो न  मैंने देखा है तुम्हें  यूं ही गाहे बगाहे  अपनी आँखों को छलकाते हुए  कभी भी कहीं भी अपनी उदासी को  ठहाके मार कर   छुपाते हुए...
ना जाने क्यों चाहता है मेरा मन हमेशा हरदम हरपाल कि हो जाऊँ तुमसे इतना नाराज चाहें फिर तुम मुझे लाख मनाओ मैं बिलकुल न सुनू तुम्हारी बात तुम कहते रहो और मैं पलट कर कोई जवाब भी न दूँ फिर तुम करो लाख मिन्नतें मुझसे बार बार देखते रहो एकटक वैसे ही निहारते हुए अपनी खिड़की पर जैसे उस दिन तुम मुझे देख रहे थे कह रहे थे बार बार आई एएम सोर्री सुनो क्या सॉरी कह देने भर माफ किया जा सकता है बोलो नहीं न लेकिन तुम्हारा दिल भी ग्लानि से भरा हुआ था तुम घबरा गए थे न मेरे दूर जाने के ख्याल मात्र से ही कैसे दर्द से छलक पड़ी थी तुम्हारी आँखें कैसे तुम रो पड़े थे और चेहरा इस कदर उतार गया था क्या तुम जानते हो तुम्हारी यह हालत देख कर मेरा क्या हाल हो रहा था मेरे जिस्म की जान ही निकाल गयी थी मैं नहीं रही थी खुद में ही कैसे गिरती पड़ती चली आई मुझे कोई होश ही नहीं था लेकिन मैं बहुत दुखी थी तुम्हारे लिए फिर भी मैं कभी नाराज होना चाहती हूँ दर्द से छटपटा कर जब रो पड़ती हूँ या तुम्हारा नाम लेकर पुकारती हूँ तो तुम आ जाते हो सामने लेकिन बहुत उदास और निराश नहीं करते कोई बात न समझा पाते हो मुझे ...
लघुकथा प्यारा रिश्ता ____________ आज ठंड कितनी ज्यादा हो रही है ? हाँ, मेरे तो पैर ही सुन्न पद गए हैं ! अच्छा ! मुझे ऐसा लग रहा है मानों मेरे पैरो में जान ही नहीं बची है ! अरे ऐसा क्यों कह रहे हो ? क्या बताऊँ मैं तुम्हें , जबसे यह सर्दी आई है मेरी हालत ही खराब हो गयी है ,लगता है यह सर्दी अबकी जान लेकर ही जाएगी ! नहीं नहीं ऐसा मत कहो ,देखना सब ठीक हो जाएगा ! क्या खाक ठीक हो जाएगा ,जबसे रिटायर हुआ हूँ घर में पड़ा रहता हूँ बस बैठे बैठे खाना और सो जाना ! कोई जिंदगी ही नहीं बची है ! क्यों कर देते हैं इतनी जल्दी रिटायर ? अभी मेरे हाथ पाँव सही चल रहे थे और घर में बैठते ही हजार बीमारियाँ लग गयी ! आप क्यों इतनी फिक्र करते हो ? एक दिन तो सभी को रिटायर होना ही है कोई जल्दी हो जाता है तो कोई देर से ! बस इसी बात पर ही तो गुस्सा आ रहा है कि जल्दी क्यों कर दिया ? अब सरकार की क्या गलती उसने तो आपको आपकी उम्र के हिसाब से ही सही समय पर किया है न ? आपकी जन्मतिथि ही गलत लिखी थी तो कोई क्या कर सकता है ? चल छोड़ यह सब बातें ! जरा सुन एक काम कर ! क्या काम ? आज गुलगुले बना कर खिला दे बड़ा मन कर...
लघुकथा क्या है मेरी गलती ? सुनो, क्या तुम अपनी पत्नी को प्यार करते हो ? प्रेमिका ने अपने प्रेमी के गाल को चूमते हुए पूछा ! हाँ क्यों नहीं करूंगा उसने अपनी पूरी जिंदगी मेरे नाम कर दी है ,मुझे बच्चों का सुख दिया, मेरा घर बार संभाला ! अच्छा, लेकिन मैं तो तुम्हें सिर्फ तुम्हें प्यार करती हूँ ! तुम भी सिर्फ मुझे क्यों नहीं करते ! मैं सिर्फ तुम्हारा कैसे हो सकता हूँ मेरी पत्नी है बच्चे हैं ,मैं उनका भी तो हूँ ! तुम सही कह रहे हो थोड़ा थोड़ा बंटे हुए हो तुम , हैं न ? पत्नी प्रेमिका फिर और भी प्रेमिकायेँ ! यह तुम क्या कह रही हो ? हाँ मैं सही ही तो कह रही हूँ ! जब तेरी इतनी प्यारी पत्नी है बच्चे हैं तो फिर तुम इधर उधर मुंह क्यों मारते फिरते हो ,? बर्बाद कर क्यों करते हो किसी और की जिंदगी केवल अपने तन के सुख की खातिर !  और एक बात सुनो तुम्हें अपनी किसी भी बात पर ज़रा सा भी गिला नहीं होता ! हैं न ?  क्या तुम्हें इस बात का अहसास भी है कि किसी के प्यार को तुम अपने स्वार्थ की खातिर लूट रहे हो ! उसे तन मन और धन से बर्बाद कर रहे हो ! तुम्हारे प्रेम में वो तुम्हें कभी कुछ मुंह से नह...
चलो आज मैं लिखती हूँ मुस्कान क्यों रोएँ हम यूं बार बार सुनो कितना अच्छा लगता है न मुसकुराना ,जब फूल कही अपने रंग और खुशबू के साथ खिले दिखते है तो देखो मन कैसे मुस्कुरा देता है ...हैं न ? तुम्हें भी तो अच्छे लगते हैं यह फूलों के रंग इनकी खुश्बु ,,तुम भी तो इनके  जैसे ही मुस्कुराते हो न , कितनी प्यारी है तुम्हारी मुस्कान , सुनो तुम्हारे चेहरे पर उदासी अच्छी नहीं लगती है ॥जैसे मुझे रोना अच्छा नहीं लगता है , जब मैं रोती हूँ तब सारी कायनात मेरे साथ रो पड़ती है उदास हो जाती है सारी दुनिया तभी तो मैं हँसना चाहती हूँ ,ज़ोर ज़ोर से खिलखिला कर हँसना ,अपनी दोनों बाँहें फैला कर आसमा को समेट लेना , जब तुम साथ होते हो तब मैं तुम्हें खूब स्नेह से देखती हूँ , खूब वात्सल्य लुटाती हूँ और बदले में मुझे मिलता है तुम्हारा दुगुना प्यार , यह दुनिया बस इसलिए ही जीवित है कि अभी बचा हुआ है प्रेम , और बचये रखूंगी , अपने अन्तर्मन में छुपाये रखूंगी , जिस दिन मेरा प्रेम नहीं होगा यह दुनिया खत्म हो जाएगी , क्योंकि तब द्वेष हाबी हो जायेगा और द्वेष यानि मृत्यु ,,,, मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती और न कुछ पाना चाहती हूँ...
झरती रहती है ओस भीगती रहती है जमी नमी कम आसमा पर भी तो नहीं है सुनो यही सच है न कि कोहरे में डूबा हुआ है जब पूरा शहर तब मैं लिखने बैठी हूँ जब सभी अपनी रजाइयों में दुबके हुए सो रहे हैं ,,,,मेरे पैर ठंड से शीत हुए जा रहे हैं मानों अकड़ गए हैं लेकिन हर बात से बेखबर मैं अपनी ही धुन में मगन लिख रही हूँ ,,,कि दिन भर गम और दर्द में डूबा हुआ मन तड़प उठा है ,,अचानक यकीन ही नहीं होता जब किसी बड़े नाम को आरोपो से घिरे हुए पाती हूँ ,,मुझे एक बात बिलकुल समझ नहीं आती है कि किसी भी गलती के लिए कोई एक दोषी कैसे हो सकता है , जब दोनों ही समझ दार हैं तो गलती का दोष पुरुष को ही क्यों ? क्या उसमें स्त्री की सहभागिता नहीं थी ? क्या वो अंजान थी ? क्या उसे कोई बात समझ नहीं आ रही थी ? क्या पुरुष इसलिए दोषी मान लिया जाता है कि वो पुरुष है ? लेकिन अगर एक पुरुष जो किसी भी स्त्री को अपना समझता तो नहीं है लेकिन उसका शोषण करता रहे ,और वो लगातार करता रहे ! स्त्री कमजोर पद जाये और पुरुष जबर पड़ जाये दबाता ही जाये उसको , तो क्या उसको कोई तकलीफ नहीं होती , उसकी स्वयम की आत्मा उसे झकझोरती नहीं है ? उसे अहसास नहीं होता है ...
क्या कहूँ तुमसे कैसे कहूँ मैं सनम तेरे प्यार में बर्बाद हो गए सुनो      जब मैं तुमसे कुछ नहीं कहना चाहती हूँ फिर भी बहुत कुछ कहना है ,इतना भरा हुआ है दिल कि हर वक्त छलकता ही रहता है ...मैं इस कदर तकलीफ में हूँ ,,मेरी आत्मा को कष्ट है बेइंतिहा कष्ट ...तुम्हारे बारे में जब सोचती हूँ तो यह कष्ट, आँसू, दर्द सब मेरा चैन छीन लेते हैं ,,,और तुम्हारे सिवाय कुछ और सोचा नहीं जाता है , मेरा दर्द मुझे सारी रात मथता है और हौले हौले आँखों से ओस की तरह झरता है भीग जाता है सुबह तक पूरा तकिया ,,इतना गीला होता है कि उसे निचोड़ सकूँ ,,,मुझे एक बात बिल्कुल समझ नहीं आती कि आखिर तुम इतना दर्द मुझे दे कैसे पाते हो , कैसे मेरी आँखों में आँसू भर देते हो क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता , तुम्हें दुख नहीं होता कोई कैसे किसी को इतना सता सकता है ,क्या इसकी कोई सजा नहीं होती है ,,मन को जो चोट लगती है उसका निदान क्या है , क्या है बताओ न तुम , बोलो ,,किस तरह से हो जाते हो तुम ऐसे , मेरा प्यार, मेरा समर्पण ,,मेरे तन मन धन के स्वामी बन गए हो ॥ मेरा जो कुछ है वोहर सब तुम्हारा है लेकिन जो तुम्हारा है क्या वो...
चाहता है मन कि दौड़ती हुई जाऊँ आसमा तक और चाँद को लगाकर गले दिल में छिपा लूँ हाथ से छूकर सूर्य को सागर की ठंडी रेत पर लेट जाऊँ लगाती रहूँ करवटें लपेट कर अपने तन पर वो चमकती हुई रेत तन को शुद्ध बनाऊँ मन तो पवित्र शुद्ध निर्मल है बस इस निर्लज्ज दुनियाँ में अपनी हया के संग जी जाऊँ ,, सीमा असीम 9,1,20 
मेरे मन में तेरे सिवाय कभी कोई नाम ना आए सनम तू ही तू रहे और मेरी ज़िंदगी गुजर जाये जब कोई गलत इंसान आपकी लाइफ से जुड़ जाता है तो वह सिर्फ आपको दुख आँसू और दर्द के सिवाय कुछ नहीं दे सकता है क्योंकि उसकी गलतियाँ इतनी ज्यादा होती है कि सिर्फ गुनहगार की लाइन में ही खड़ा किया जा सकता है वो एक खुदगर्ज इंसान होता है और अपने स्वार्थ के अलावा और कुछ भी नजर नहीं आता वो आपको कभी कोई सुख या खुशी नहीं दे सकता ,,दरअसल वो खुद अपनी खुशी के लिए भटकता फिरता है और उसे जहां भी कहीं से थोड़ी खुशी नजर आती है वही पर गिर जाता है म्वो यह बिलकुल नहीं सोचता है कि उसके इस व्यवहार से अगले बंदे को कितनी तकलीफ होगी ,,,कितना कष्ट होगा ,,,वो कहाँ समझेगा इन सब बातों को ,, उसे कहाँ समझ आएगा ,,,वो तो अपनी मस्ती में रहता है और अपनी मस्ती के लिए कुछ भी कर सकता है ,,,,,,कोई भी तरीका निकाल सकता है ,,,,क्योंकि वो सिर्फ अपने लिए ही जी रहा होता है , अपनी खुशी के लिए , अपनी मस्ती के लिए ,,,और दूसरों को हर तरह से परेशान करने के लिए ,रुलाने, सताने  और परेशान करने के लिए ,,,,,, हे मानव मत कर इतना गुरूर तू एक दिन तेरा नाम मि...
कितना कुछ कहना चाहती हूँ मैं हाँ तुमसे सिर्फ बातें करना चाहती हूँ यही तो सच है न कि मैं तुमसे ढेर सारी बातें करके खुद को हल्का करना चाहती हूँ , क्या तुम जानते नहीं कि मेरे मन में कितनी सारी बातें भरी हुई हैं जो एक दूसरे में उलझ कर गांठ सी बन रही हैं कुछ करो न ऐसा कि मैं तुमसे अपने मन की एक एक बात कह दूँ और खाली हो जाऊँ और उलझने सुलझ जाये मेरा मन फूल सा हल्का हो जाये जिससे मैं आसानी से फुदक सकु मन का कर सकूँ खुशियाँ मना सकु और खूब झूम कर नाच लूँ , मैं तुमसे बेपनाह प्रेम करती हूँ न तो मैं उस पवित्र निर्मल और अपने अडिग प्रेम में तुमको डुबो सकूँ वैसे तुम दुबे हुए ही हो और सर तक दुबे हुए हो तुम तैरने की कोशिश तो करते हो लेकिन अनाड़ी तैराक की तरह अपने हाथ पाँव चलते हो और फिर से गहरे में डूब जाते हो ,,मत कोशिश करो तैरने की तुम डूबे ही रहो गहरे और गहरे ,,,,, कि तुमसे ही है अब मेरी जिंदगी की सांझ ओ सहर कि तुम बिन जिंदगी का एक पल भी गवारा नहीं है ... सीमा असीम 7,1,20 
बहती दरिया सी हूँ  भोली चिड़िया सी हूँ  मैं सच हूँ अगर  तो तुम सिर्फ मेरे ,,,, सुनो प्रिय               कहना चाहती हूँ तुमसे अंगीन बातें मैं बताना चाहती हूँ कि तुम आखिर कब समझोगे सच को प्रेम को और इश्क को ,,,,क्या तुम नहीं जानते कि हमेशा अपना मन अपनी नियत साफ रखो ,,इतना साफ कि तुम्हें कभी शर्मिंदगी का अहसास न हो ,,, न कभी तुम्हें मुझसे माफी मांगनी पड़े ,,कोई जरूरत नहीं है मुझसे माफी मांगने की ,,क्या कभी कोई अपनों से भी माफी मांगता है ,,क्या कोई अपनों का इस तरह से अपना बना लेता है कि कभी उससे कुछ छिपा ही न सके ,,, कह दिया करो अपने मन की हार बात मुझसे जैसे मैं कह देती हूँ ,,,जैसे मैं नहीं चाहती कभी कोई बात मैं गलत कह दूँ या तुमको ही गलत कह दूँ ,,,क्योंकि मैं कभी नहीं चाहती कि तुम्हारा कभी भी दिल दुखे या मेरी वजह से तुम्हारी आँख नम हो या आँखों से आँसू बहें ,,,,सुनो तुम मुझे दुख दर्द आँसू जो कुछ बदले में रिटर्न गिफ्ट देते हो ,,मैं वही स्वीकार कर लेती हूँ क्योंकि जिसके पास जो कुछ होता है वो ही तो देगा ,,तुम आखिर कैसे खुशियाँ ,सुख...
भर आती हैं आँखें और छलक जाती हैं बात बात पर बिना बात पर और कभी खुशी से महक जाती हैं आँखें चमकती हुई सी काजल के रंग में भी गुलाबी गुलाबी यही होता है अक्सर मेरे साथ पल भर में खुशी से नाचती हुई और अगले ही पल दर्द से भरकर आँसू बहाती हुई नहीं सहा जाता मुझसे , मैं नहीं सहन कर पाती हूँ सच में बहुत मुश्किल हो जाता है कभी कभी खुद ही खुद को समझाना क्योंकि मैं तो सब कह देना चाहती हूँ और तुम सब छुपा लेना चाहते हो क्यों जाने क्यों ? क्या तुम सबकुछ मुझसे कह कर हल्का नहीं होना चाहते क्या तुम वो सब मुझे नहीं बताना चाहते जो तुम्हारे दिल में है तुम्हारे मन में है जहां प्रेम है वहाँ सब कुछ कह देना चाहिए जैसे मैं कहना चाहती हूँ तुमसे अपने हर पल की बातें कि कैसे मैं आज खुश थी और कैसे दुखी कैसे आज मैंने अपना दिन गुजारा और कैसे मैं तुम्हें याद करती रही अपने खाने पीने सोने जागने आने जाने मिलने और वे तमाम बातें मैं तुम्हें कहना चाहती हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहती कि हमारे बीच एक बाल बराबर भी दूरी हो किसी भी तरह से आखिर हो भी तो क्यों हो मैं तेरी ही हूँ और तुम मेरे फिर हम अलग कहाँ है...
शिकायत नहीं है मुझे तुमसे कोई तुम जैसे हो बस वैसे ही रहना ,,, क्यों कहूँ तुमसे कोई बात या करूँ तुमसे ढेरों गीले शिकवे जो हैं मेरे मन में मैं तो बस यही कहूँगी कि मन तो तुम्हारा भी है इसलिए जरूरी नहीं है कि वो मेरे हिसाब से चलेगा बस मैं खुश हूँ कि तुम चाहे जैसे मुझे रखना चाहों दुख दर्द में या सुख में ,,क्योंकि मैं तो वैसे ही रह लूँगी लेकिन तुम यह सोच लो कि मेरे दुख में तकलीफ तुम्हें हो जाएगी , तड़प तुम जाओगे मेरा क्या है मैं तो रो धो कर खुद को और भी ज्यादा पाक साफ कर लूँगी और उस दुख में भी अपने प्रेम को जी लूँगी लेकिन तुम ऐसा नहीं कर पाओगे न कहाँ कर पाओगे जरा से दुख में भटकने लगोगे ,, सनम यह जीवन है इसमे सुख दुख तो लगे ही रहते हैं ,हाँ बहुत दुख हैं जीवन इस नश्वर जीवन में लेकिन हम तो एक दूसरे को कोई दुख तकलीफ या आँसू तो न दें ,,, किसी भी तरह से दिल न दुखायेँ ... मैं नहीं चाहती तुम्हें कभी कोई दुख या तकलीफ सताये ! अगर मेरे सिवा कोई और तुम्हें परेशान करता है तो वो मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है ... मैं नहीं चाहती कि कोई तुम्हारी तरफ नजर उठा कर भी देखे .... न जाने क्यों यह मेरा दिल मुझे बेचैन क...