तुम्हें चाहा — जैसे धूप में कोई साया चाहे, जैसे थकी आँखें कोई ख्वाब चाहें, बिना जाने, बिना समझे, बस दिल ने कहा बस तुम चाहिए मुझे तुम्हें माँगा हर दुआ में, हर प्रार्थना में, खाली हाथों की हर याचना में, रब ने सुनी तो होगी मेरी सदा, जो तुम मेरी लकीरों में आये तुम्हें पाया — तो लगा ज़िंदगी मिल गई, अधूरी सी जो थी, वो पूरी खिल गई, तुम मिले तो इश्क़ को नाम मिला, तुम हो तो हर लम्हे को मुकाम मिला, चाहा था, माँगा था, पा लिया तुम्हें, अब बस तुम्हीं में उम्र तमाम हो जाए... सीमा असीम 11,8,26
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प्रेम जब मन में उतर आता है... तो घंटी नहीं बजती, बस अंदर कहीं बहुत धीरे से एक रोशनी जल जाती है, और तुम रोज़ के वही काम थोड़े ज़्यादा मन से करने लगते हो। तब आईने में चेहरा वही रहता है, पर आँखों में कोई और झांकने लगता है, गुस्सा थोड़ा देर से आता है, और माफ़ करना थोड़ा जल्दी आ जाता है। प्रेम जब मन में उतर आता है, तो तुम किसी को पाना नहीं चाहते, बस ये चाहते हो कि जिस वजह से मन इतना हल्का है, वो वजह कहीं उदास न हो... सीमा असीम 10,8,26
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देवदार तले" घने पेड़ों की छाँव या देवदार तले, चलें वहाँ जहाँ दुनिया ज़रा ठहरे। न शोर हो, न कोई जल्दी हो, बस तुम्हारा हाथ, मेरा हाथ हो, और हवा में हमारे किस्से बिखरे। देवदार की खुशबू में लिपटा हो वक्त, और हम भूल जाएं, क्या खोया, क्या पाया, घने पेड़ों की छाँव तले, बस एक पल, जो सिर्फ हमारा हो। सीमा असीम 9,8,26