जब मैं खुद पर ही शर्मिंदा हो जाती हूँ तो बहते हुए अश्क भी मुस्कुरा देते हैं मेरी मूर्खता पर समझ नहीं आता है तब कि मैं अब ऐसे हाल में क्या प्रतिक्रिया दूँ ...हद है वाकई हद है तुम इतने जलील और गिरे हुए कैसे हो सकते हो मेरी समझ से परे है ॥तुम सामने से धोखे पर धोखे दे रहे हो और मैं निभाए जा रही हूँ लानत है मुझपर मेरे स्त्री होने पर ,,,या तुम जैसे पुरुष के साथ निभाने पर जो शख्स इतना गिर सकता है और बार बार गिरता ही चला जाता है वो मेरा सच्चा साथी नहीं हो सकता बिल्कुल नहीं हो सकता, जिसे अपना समझा सब खत्म कर लिया जिस के लिए वो एक जाहिल और नीच इंसान है ,,सच में आज इंसानियत शर्म सार है कि तुम मुझे सामने से दुख दे रहे हो रुला रहे हो मेरे विश्वास को छलनी कर रहे हो और मैं चुपचाप से सहन कर रही हूँ क्योंकि मैं सपने में भी तुम्हें दुख देने का सोच भी नहीं सकती और तुम हो कि सिर्फ दुख और दर्द ही देना जानते हो कभी कोई सुख या खुशी दी है वैसे तेरे पास जो है तू वही तो मुझे देगा ,,,धोखेवाज़ इंसान तू नंबर एक का दगाबाज है और हमेशा ही रहेगा ,,मैं ही बेवकूफ हूँ जो हर बार तेरी बातों में आ जाती हूँ और तुझ पर अपना अटूट विश्वास बनाए रखती हूँ ,,,,,,

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

यात्रा