कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।

कहते है कि कहते -सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। सब  देख कर समझ कर  भी अगर यह मन होश में नहीं आता है तो आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है, अर्थात न हम  सुधरे हैं और न हम सुधरने की कोशिश कर रहे हैं !

सीमा असीम 
8,3,20 


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