कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।
कितना सही कहा है कबीर दास जी ने कि मन अगर उलझ जाये तो कभी भी सुलझता नहीं है आप चाहें लाख कोशिश कर लो लेकिन उलझे मन को सुलझाना सरल नहीं है ! मन हवा के समान होता है और बहुत ही चंचल भी होता है इसलिए यह एक जगह पर कभी टिकता ही नहीं है परंतु कभी कभी यह ऐसा उलझता है पूरी जिंदगी गुजार लो फिर यह संभलता नहीं है ! जैसा पहले दिन था बिलकुल वैसा ही बना रहता है यानि कि मन को होश नहीं आया है ! इसकी अवस्था आज भी पह;ले दिन जैसी बनी हुई है !!सीमा असीम 22,3,20 
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