बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।कितना सही कहा है कबीर दस जी ने कि हमारे शब्द , हमारी भाषा और हमारी बोली बहुत अनमोल होते हैं इनको यूं ही जाया नहीं करना चाहिए क्योंकि हम किसी रत्न , आभूषण या किसी कीमती चीज को यूं ही बेकार में इधर उधर नहीं फेंकते हैं हम उसे बहुत संभाल कर , सहेज कर रखते हैं जिससे इन पर किसी की गलत या बुरी नजर न पड़े उसी तरह से शब्दों को भी अपने हृदय में नाप तोल कर ही बोलना चाहिए कुछ भी मन में आए उसे नहीं कह देना चाहिए ॥!सीमा असीम 21,3 20 
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