मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।सच ही तो कहा है कि मन बहुत चंचल स्वभाव का होता है उसे वश में करना संभाव नहीं है इसकी अनन्त  इच्छाएं अभिलाषाएं होती  हैं जिनको पूरा करना किसी के भी हाथ में नहीं होता अतः कोशिश करो इंका त्याग कर दो क्योंकि पानी से अगर घी निकल आए तो फिर कोई भी सुखी रोटियाँ नहीं खायेगा ...सीमा असीम 27,3, 20 


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