जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

ऐसा ही तो होता है न जब तक मैं मैं रहता है तब तक हमारे मन में अहंकार का दीपक जलता रहता है और हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता सिर्फ खुद के होने का भ्रम बना रहता है लेकिन जब मन से मैं का होना मिट जाता है खत्म हो जाता है तब हमें समझ आता है कि मैं तो कुछ है ही नहीं जो कुछ है वो हम है और सब कुछ उस ईश्वर का है उसके होने से ही हमारा अस्तित्व है जैसे दीपक के जलते ही सारा अंधकार खत्म हो जाता है रोशनी बिखर जाती है उसी तरह से मन से अहम और मैं के खात्मे से ही ज्ञान का दीप जलता है और भ्रम खत्म होता है हमें सच का भान होता है ....सीमा असीम 3,3,20 

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