दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
कितना सही है न
कि हमें कितनी मुश्किल से यह मनुष्य का जीवन मिलता है , इतना सुंदर शरीर मिलता है, गुण भाव विचार और संस्कार वाला मन होता है फिर भी इंसान इसको यूं ही व्यर्थ व्यातीत कर देता है और कोई ऐसा करी नहीं करता जिससे मानव जीवन सफल हो जाये क्योंकि बार बार तो मिलता नहीं है मनुष्य का जीवन ,,जैसे पेड़ पर लगा हुआ पत्ता अगर टूटकर गिर जाये तो फिर पेड़ पर नहीं लगाया जा सकता आप चाहें कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें ,,,,
सीमा असीम
6,3,20
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