कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।
हाँ ऐसा ही तो होता है न कि हम जैसे लोगों के साथ उठते बैठते हैं बात चीत करते हैं संग साथ करते हैं हम बिलकुल वैसे ही होते जाते हैं उनकी ही तरह ,उनके जैसा ही सोचने समझने लगते हैं उनके जैसा स्वभाव बना लेते हैं या खुद ही बन जाता है चाहे वो संगी साथी अच्छा हो या बुरा हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है ,,कबीर जी कहते भी हैं कि यह हमारा शरीर किसी पंछी के समान है इसका जहां मन करता है वहाँ उड़ कर चला जाता है वो अपने मन का गुलाम हो गया है उसे अपने मन को वश में करना नहीं आता है बल्कि मन के वश में हो गया है .......
सीमा असीम
5,3,20
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