लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार। कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार॥ कबीर दास जी कहते हैं कि घर बहुत दूर है और रास्ता बहुत कठिन, साथ ही इस रास्ते में अनेक प्रकार के चोर और ठग हैं जो हमें हमेशा ठगते रहते हैं हमारा नुकसान करते हैं तकलीफ देते है और स्वयं को फिर भी सही बताते रहते हैं तो बताओ ऐसे लोगों को ईश्वर के दर्शन कैसे हो ? क्योंकि संसार में कठिन जीवन के साथ अनेक बाधाएँ हैं विपत्तियाँ हैं ,, और हम उनमें ही पड़े रहते और भ्रमित होते रहते हैं ,,अनेकों आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं जिस कारण हम अपने लक्ष्य को भूल जाते हैं और अपनी पूंजी को गवां देते हैं ....सीमा असीम 31,2,20 x
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Showing posts from March, 2020
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एक ही बार परखिये ना वा बारम्बार । बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार॥ मुझे ऐसा लगता है कि हम किसी भी इंसान को एक नजर देख कर भी पहचान जाते हैं कि वो कैसा व्यक्ति है और उसकी कैसी आदतें हैं ? लेकिन अगर जरूरत पड़े तो एक बार उसे जांच परख लो लेकिन उसे बार बार न जाँचों परखो क्योंकि रेत को कितनी भी बार छाना जाये उसकी किरकिराहट वैसी ही बनी रहेगी उसके अंदर मुलायमियत नहीं आयेगी ठीक वैसे ही किसी मूर्ख दुष्ट व्यक्ति को कितनी ही बार उसे जाँच परख लो वो उसी तरह से अपनी मूर्खता से भरा रहेगा उसके अंदर जो दुष्टता का भाव है वो कभी कम नहीं होगा लेकिन एक सरल का व्यक्तित्व एक बार में ही समझ आ जाता है परंतु मूर्ख और दुष्ट व्यक्ति बार बार समझने के बाद भी समझ नहीं आता है ! सीमा असीम 30,2,20 x
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कबीर दास जी की गज़ल ____________________ हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई। पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई। सच ही तो कहा है कि मन बहुत चंचल स्वभाव का होता है उसे वश में करना संभाव नहीं है इसकी अनन्त इच्छाएं अभिलाषाएं होती हैं जिनको पूरा करना किसी के भी हाथ में नहीं होता अतः कोशिश करो इंका त्याग कर दो क्योंकि पानी से अगर घी निकल आए तो फिर कोई भी सुखी रोटियाँ नहीं खायेगा ... सीमा असीम 27,3, 20
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कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ। हमें बचपन से ही सिखाया जाता है न कि आपको ऐसे मित्रों का साथ करना चाहिए जिनका व्यवहार संस्कार अच्छा हो जिससे हम भी वैसे ही बने ! अच्छे और संस्कारी लोगों के साथ रहने से उठने बैठने से हमरे अंदर वही भाव और विचार आते हैं तभी तो कबीर जी ने कहा है कि आप जैसा साथ करोगे वैसा ही फल पाओगे अगर आप मन के गुलाम हुए तो आपका तन भी वैसा ही बनेगा ! मन को वश में करना संसारी व्यक्ति के लिए संभव तभी है जब वो संयम के साथ रहे और मन के हिसाब से न चले !! सीमा असीम 25,3,20 x
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पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात। कबीर जी का कथन कितना सही है कि हमारा यह शरीर नश्वर है इस पर गर्व अहंकार या घमंड कियारना व्यर्थ है ! रावण ने भी बहुत घमंड किया था , बहुत अहंकार था उसे कि मैं दुनिया में सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ मेरा पास सोने की लंका है मुझे कोई नहीं हरा सकता है, कोई नहीं मार सकता है ,,मैं अमर हूँ लेकिन उसका घमंड ही उसे ले डूबा ,तो हे मानुष तुझे किस बात का घमंड है क्या इस शरीर पर ,,? यह शरीर पानी के बुलबुले के समान है ठीक उसी तरह से जैसे सुबह होते ही तारे आसमान में कहीं छुप जाते हैं .... सीमा असीम, 24,3,20
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माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। कबीर दास जी कहते हैं कि इस झूठे और नश्वर संसार में जो इंसान अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं वे सिर्फ अपना भला चाहते हैं इसलिए भगवान भगवान करते रहते हैं लेकिन उनके मन में छल कपट भरा रहता है वे दूसरों को नीचा दिखाते हैं उनका अपमान करते हैं और उनके स्नेह का लाभ उठाकर उन्हें या तो बर्बाद कर देते हैं या उनका सब कुछ छीन लेते हैं सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही वो सब कुछ करते हैं लेकिन जो इंसान सच्चे भाव से ईश्वर को मानते हैं वे कभी भी झूठा या दिखावा नहीं करेंगे कि हाथ में मोतियों की माला ले ले और उसे फेरते रहें बल्कि अपने सच्चे मन से अपनी आत्मा से उसके लिए अच्छा करेंगे उसका भला करेंगे ,,,,और मन ही मन उसका जाप करेंगे ......बोलना कहना यह सब झूठ होते हैं मन से किया जाने वाला काम हमेशा सही और सच्चा होता है .... सीमा असीम 23,3,20
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माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। कबीर दास जी कहते हैं कि इस झूठे और नश्वर संसार में जो इंसान अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं वे सिर्फ अपना भला चाहते हैं इसलिए भगवान भगवान करते रहते हैं लेकिन उनके मन में छल कपट भरा रहता है वे दूसरों को नीचा दिखाते हैं उनका अपमान करते हैं और उनके स्नेह का लाभ उठाकर उन्हें या तो बर्बाद कर देते हैं या उनका सब कुछ छीन लेते हैं सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही वो सब कुछ करते हैं लेकिन जो इंसान सच्चे भाव से ईश्वर को मानते हैं वे कभी भी झूठा या दिखावा नहीं करेंगे कि हाथ में मोतियों की माला ले ले और उसे फेरते रहें बल्कि अपने सच्चे मन से अपनी आत्मा से उसके लिए अच्छा करेंगे उसका भला करेंगे ,,,,और मन ही मन उसका जाप करेंगे ......बोलना कहना यह सब झूठ होते हैं मन से किया जाने वाला काम हमेशा सही और सच्चा होता है .... सीमा असीम 23,3,20 x
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कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन। कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन। कितना सही कहा है कबीर दास जी ने कि मन अगर उलझ जाये तो कभी भी सुलझता नहीं है आप चाहें लाख कोशिश कर लो लेकिन उलझे मन को सुलझाना सरल नहीं है ! मन हवा के समान होता है और बहुत ही चंचल भी होता है इसलिए यह एक जगह पर कभी टिकता ही नहीं है परंतु कभी कभी यह ऐसा उलझता है पूरी जिंदगी गुजार लो फिर यह संभलता नहीं है ! जैसा पहले दिन था बिलकुल वैसा ही बना रहता है यानि कि मन को होश नहीं आया है ! इसकी अवस्था आज भी पह;ले दिन जैसी बनी हुई है !! सीमा असीम 22,3,20 x
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बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि। कितना सही कहा है कबीर दस जी ने कि हमारे शब्द , हमारी भाषा और हमारी बोली बहुत अनमोल होते हैं इनको यूं ही जाया नहीं करना चाहिए क्योंकि हम किसी रत्न , आभूषण या किसी कीमती चीज को यूं ही बेकार में इधर उधर नहीं फेंकते हैं हम उसे बहुत संभाल कर , सहेज कर रखते हैं जिससे इन पर किसी की गलत या बुरी नजर न पड़े उसी तरह से शब्दों को भी अपने हृदय में नाप तोल कर ही बोलना चाहिए कुछ भी मन में आए उसे नहीं कह देना चाहिए ॥! सीमा असीम 21,3 20 x
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कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस। कितना सही कहा है कबीर जी ने कि हे मूर्ख मनुष्य तू किस बात पर इतना इतराता है गर्व करता है न जाने क्या सोचता है किस बात का अहंकार पाल रखा है क्या तुझे पता भी है कि तेरा यह जिस्म जिसे तूने बड़े नखरे से पाला है और इस पर इतना नाज करता है लेकिन तुझे यह बात नहीं पता है तेरे जिस्म पर जो सर है न उस पर जो खूबसूरत बाल हैं वे काल के हाथों में फंसे हुए हैं और वो तुझे कब कहाँ अपने साथ ले जाये या मार डाले चाहें वो अपना देश हो या परदेश हो ,तुझे बिलकुल पता भी नहीं चलेगा .....इसलिए घमंड करना छोड़ दे .... सीमा असीम 20,3,20
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झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह। माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥ कितना सही कहा है कि पत्थर के ऊपर कितना भी पानी बरसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि पानी के बरसने से मिट्टी तो बीग कर गीली हो गयी किन्तु जो पत्थर था वो वैसे का वैसा ही रहा ! इसी प्रकार इंसान भी है अगर कोई सच्चा और कोमल मन का है वो बहुत जल्दी पसीज जाता है किन्तु एक सख्त इंसान कभी भी नहीं पिघलेगा चाहे लाख कोशिश कर लो !! सीमा असीम 14,3,20 x
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बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि। वाकई हमारे शब्द हमारी भाषा और हमारी बातें अनमोल हैं इन का कोई भी मोल नहीं है मूल्य नहीं है और कभी हो भी नहीं सकता हमारी बोली कीमती और अमूल्य रत्न के समान है अगर इसे कोई खरीदना चाहे तो कितनी भी कीमत चुका कर खरीद नहीं सकता है इसलिए हमेशा बहुत सोच विचार के बाद ही अपने मुंह से कोई शब्द निकालने चाहिए क्योंकि एक बार मुंह से निकले शब्द वापस मुंह में नहीं जा सकते या लौटाए नहीं जा सकते ! यह शब्द और बातें ही होती हैं जिससे हम किसी को अपना बना सकते हैं या किसी को खो सकते हैं ......सीमा असीम 12,3,20
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लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल, लाली देखन मैं गयी मैं भी हो गयी लाल सच कहूँ तो सच यही है कि मैं जिधर देखती हूँ उधर तुम ही तुम नजर आ रहे होते हो और जब मैं पास जाकर महसूस करती हूँ तो मुझे लगता है मैं भी तुम्हारे रंग में रंग गयी हूँ .... हाँ वही रंग हो गया है अब मेरा जो तुम्हारा रंग है ....हम एक ही रंग में रंगे हुए हैं अलग नहीं हैं एक दूसरे से .....
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जब मैं खुद पर ही शर्मिंदा हो जाती हूँ तो बहते हुए अश्क भी मुस्कुरा देते हैं मेरी मूर्खता पर समझ नहीं आता है तब कि मैं अब ऐसे हाल में क्या प्रतिक्रिया दूँ ...हद है वाकई हद है तुम इतने जलील और गिरे हुए कैसे हो सकते हो मेरी समझ से परे है ॥तुम सामने से धोखे पर धोखे दे रहे हो और मैं निभाए जा रही हूँ लानत है मुझपर मेरे स्त्री होने पर ,,,या तुम जैसे पुरुष के साथ निभाने पर जो शख्स इतना गिर सकता है और बार बार गिरता ही चला जाता है वो मेरा सच्चा साथी नहीं हो सकता बिल्कुल नहीं हो सकता, जिसे अपना समझा सब खत्म कर लिया जिस के लिए वो एक जाहिल और नीच इंसान है ,,सच में आज इंसानियत शर्म सार है कि तुम मुझे सामने से दुख दे रहे हो रुला रहे हो मेरे विश्वास को छलनी कर रहे हो और मैं चुपचाप से सहन कर रही हूँ क्योंकि मैं सपने में भी तुम्हें दुख देने का सोच भी नहीं सकती और तुम हो कि सिर्फ दुख और दर्द ही देना जानते हो कभी कोई सुख या खुशी दी है वैसे तेरे पास जो है तू वही तो मुझे देगा ,,,धोखेवाज़ इंसान तू नंबर एक का दगाबाज है और हमेशा ही रहेगा ,,मैं ही बेवकूफ हूँ जो हर बार तेरी बातों में आ जाती हूँ और तुझ पर अपना अट...
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कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन। कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन। कहते है कि कहते -सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। सब देख कर समझ कर भी अगर यह मन होश में नहीं आता है तो आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है, अर्थात न हम सुधरे हैं और न हम सुधरने की कोशिश कर रहे हैं ! सीमा असीम 8,3,20
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दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार। कितना सही है न कि हमें कितनी मुश्किल से यह मनुष्य का जीवन मिलता है , इतना सुंदर शरीर मिलता है, गुण भाव विचार और संस्कार वाला मन होता है फिर भी इंसान इसको यूं ही व्यर्थ व्यातीत कर देता है और कोई ऐसा करी नहीं करता जिससे मानव जीवन सफल हो जाये क्योंकि बार बार तो मिलता नहीं है मनुष्य का जीवन ,,जैसे पेड़ पर लगा हुआ पत्ता अगर टूटकर गिर जाये तो फिर पेड़ पर नहीं लगाया जा सकता आप चाहें कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें ,,,, सीमा असीम 6,3,20
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कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ। हाँ ऐसा ही तो होता है न कि हम जैसे लोगों के साथ उठते बैठते हैं बात चीत करते हैं संग साथ करते हैं हम बिलकुल वैसे ही होते जाते हैं उनकी ही तरह ,उनके जैसा ही सोचने समझने लगते हैं उनके जैसा स्वभाव बना लेते हैं या खुद ही बन जाता है चाहे वो संगी साथी अच्छा हो या बुरा हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है ,,कबीर जी कहते भी हैं कि यह हमारा शरीर किसी पंछी के समान है इसका जहां मन करता है वहाँ उड़ कर चला जाता है वो अपने मन का गुलाम हो गया है उसे अपने मन को वश में करना नहीं आता है बल्कि मन के वश में हो गया है ....... सीमा असीम 5,3,20
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माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। वो कहते हैं न कि अगर हमारा मन साफ नहीं है, पवित्र नहीं है और बाहर से कुछ कहते हैं और अंदर से कुछ और बोलते हैं ऐसे लोग भगवान को कितना भी मनाए वे नहीं सुनते न ही ध्यान देते हैं लेकिन जिंका मन स्वच्छ है बेकार की बातों और दिखबे से दूर है उसे भगवान से कहने की भी जरूरत नहीं होती वे खुद बख़ुद हमारी बातें सुन लेते हैं और हमसे तारतमय स्थापित कर लेते हैं इसलिए उनको ज़ोर बुलाने पुकारने या रटने की जरूरत नहीं है सिर्फ सच्चे मन से स्मरण करते रहो जपते रहो फिर देखना तुम्हारी सब समस्याओं का हल निकाल आएगा .... सीमा असीम 4,3,20
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जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही । सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।। ऐसा ही तो होता है न जब तक मैं मैं रहता है तब तक हमारे मन में अहंकार का दीपक जलता रहता है और हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता सिर्फ खुद के होने का भ्रम बना रहता है लेकिन जब मन से मैं का होना मिट जाता है खत्म हो जाता है तब हमें समझ आता है कि मैं तो कुछ है ही नहीं जो कुछ है वो हम है और सब कुछ उस ईश्वर का है उसके होने से ही हमारा अस्तित्व है जैसे दीपक के जलते ही सारा अंधकार खत्म हो जाता है रोशनी बिखर जाती है उसी तरह से मन से अहम और मैं के खात्मे से ही ज्ञान का दीप जलता है और भ्रम खत्म होता है हमें सच का भान होता है .... सीमा असीम 3,3,20
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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय। रे मन तू इतना धीरज रख कि दुनिया खत्म हो जाये पर तेरा धैर्य कम न हो और तू अपने सत्कर्म करता जा अगर कोई गलत है गलत कर रहा है तो यह उसकी ही समस्या है उसकी ही गलती है करने दो उसे जो चाहे करना हो करने दो तेरे कर्म हमेशा तेरे साथ हैं और समय आने पर तुझे तेरे कर्मों का फल मिल जायेगा ... जरूर मिलेगा और खुशियाँ अपना दामन फैलाये तेरे आस पास बिखर जायेंगी ,, ओ मेरे मन तू अपने सत्कर्म करता रह और फल जरूर मिल जाएगा ... सुनो मैं जब निःशब्द हो जाती हूँ न तब बहुत बोल रही होती हूँ ... क्या तुम सुन रहे हो और साथ साथ बोल भी रहे हो न सीमा असीम 2,3,20