यादों में हो मेरे सनम तुम ही तुम, ख्यालों में हो, ख्वाबों में हो तुम ही तुम। सुबह देखूँ तो तेरी ही रौशनी है, शाम ढले तो तेरी ही कमी है। हवा चले तो तेरी खुशबू लाए, दिल धड़के तो तेरा ही नाम दोहराए। और क्या माँगू मैं इस खुदा से सनम, जब मेरी हर दुआ में हो तुम ही तुम।
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तुम ही हो मेरे... तुम ही हो मेरे सुबह की पहली रौशनी, तुम ही हो मेरे शाम की आखिरी ख्वाहिश। तुम ही हो मेरे लबों की अधूरी हँसी, तुम ही हो मेरे दिल की पूरी ख़ामोशी। तुम मिलो तो लगता है, सब मिल गया, तुम न हो तो लगता है, कुछ भी नहीं रहा। तुम ही हो मेरे हर ख्वाब का मतलब, तुम ही हो मेरे हर लफ्ज़ का मकसद। तुम हाथ थाम लो तो सफर आसान लगे, तुम साथ चलो तो हर राह में आसमान लगे.. सीमा असीम 8,8,26
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मेरे प्रिय, मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ, अथाह, अनंत मेरे प्रिय, मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ, जैसे दिया बाती से करता है — बिना किसी शर्त के, बिना किसी शोर के, बस जलता है निरंतर.. ये प्रेम गिना नहीं जा सकता, न दिनों में, न सालों में। ये अथाह है — जैसे आँखें बंद करूँ तो भी तुम, और आँखें खोलूँ तो भी तुम। मैंने तुम्हें पाने के लिए प्रेम नहीं किया, मैंने प्रेम किया, इसलिए तुम्हें हर जगह पा लिया। तुम पास हो तो संसार पूरा लगता है, तुम दूर हो तो भी मन खाली नहीं लगता, क्योंकि तुम तो मन में हो — और मन तो अनंत है। अगर कभी पूछो कि कितना, तो इतना समझना — जितना शब्द कह न सकें, और जितना मौन छुपा न सके। तुम्हारी मैं वही जो तुम्हें मन में रखती है, अनंत तक। सीमा असीम 7,8,26
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तू है पर तेरी याद गले लगाती है तू है पर तेरी याद गले लगाती है, जैसे शाम ढले चाय याद आती है। तू पास है, फिर भी हवा में ढूँढू तुझे, तेरी खुशबू हर खाली कोने में मुस्कुराती है। कभी-कभी लगता है, तू नहीं, तेरा एहसास मेरे साथ चलता है, मेरे शब्दों में, मेरी चुप्पी में, वो ही तो हर बात संभालता है। तू है पर तेरी याद गले लगाती है, और इसी याद में, मैं खुद को थोड़ा और पा जाती हूँ।
लोहिया पुल की औरतें
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लोहिया पुल की औरतें बरेली में लोहिया पुल के ठीक नीचे एक छोटा सा प्राइमरी स्कूल था। पीपल के पेड़ वाला स्कूल। उस स्कूल में पिछले बाईस साल से सुजाता पढ़ा रही थी। सुजाता मैडम। स्कूल क्या था, दो कमरे और एक बरामदा। एक कमरे में पहली और दूसरी, दूसरे में चौथी और पाँचवी। तीसरी क्लास बरामदे में बैठती थी, पीपल की छाया में। दीवारों पर बच्चों के हाथ से बने चार्ट टंगे थे - 'क से कबूतर', 'नदी के लाभ'। एक कोने में टूटी हुई ब्लैकबोर्ड थी जिस पर सुजाता रोज़ सुबह चॉक से लिखती - 'आज का सुविचार'। बाईस साल में उस स्कूल से कितने बच्चे निकले, इसका हिसाब सुजाता ने कभी नहीं रखा। रिक्शा वालों के बेटे, सब्जी बेचने वालियों की बेटियाँ, पुल के नीचे झुग्गी में रहने वाले वो बच्चे जिनके बाप-दादों ने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था। सुजाता उन्हें अक्षर नहीं, नाम देती थी। फिर एक दिन एक नोटिस आया। नगर निगम की मुहर लगा हुआ। "लोहिया पुल चौड़ीकरण योजना के अंतर्गत पीपल वाला प्राइमरी स्कूल भवन को ध्वस्त किया जाना है। यहाँ एक आधुनिक पार्किंग कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा। छात्रों को तीन किलोमीटर दूर शिवप...