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मैं रात भर जगती रही

 मैं तड़पती रही  मैं मचलती रही  रात भर यूँ ही  करवट बदलती रही  नींद आँखों से मेरे  कोसों दूर थी  फ़िक्र तेरी मुझे  लगी ही रही  तू तो सोया होगा  चैन से रात भर  सुंदर ख़्वाबों में तू  खोया होगा  मैं दुआ तुझे  देती रही.. मैं तड़पती रही  मैं मचलती रही रात भर  यूँ ही  करवट बदलती रही  जो हुआ वो थी  रब की मर्जी  अब जो होगा वो भी है  रब की रजा  फिर क्यों सदा दिल् से  आती रही रही  याद तेरी मुझे  क्यों आती रही  क्यों रुलाती रही  जो ख़्वाबों को  हमने  सजाया कभी  टूट कर सब चूर हो गये  कांच इतने चुभे  दर्द इतने जगे  मुझे होश में  बेहोशी छाती रही  मैं तड़पती रही  मैं मचलती रही  रात भर करवट बदलती रही.... सीमा असीम 

क्या होता है ऐसा

 क्या ऐसा होता है  ≠========== कभी-कभी हम किसी व्यक्ति के लिए  या परिस्थितियों की वजह से  बहुत रोते हैं  बहुत दुखी होते हैं  बहुत परेशान होते हैं  दिन हफ्ते महीने और सालों गुजार देते हैं  उसे याद कर करके  रो रो के   पर हम कभी  सामने वाले की स्थिति नहीं समझ पाते या  हम जानने की कोशिश ही नहीं करते या  हम बेहद मजबूर बेबस हो जाते हैं या  फिर हम उसे ही गलत ठहरा देते हैं  पर उसकी मनःस्थिति जान ही नहीं पाते कि  क्या उसके मन में है  या क्या वो भी सही है  क्या होता है ऐसा ही  कभी किसी के साथ या  मेरे या आपके साथ.... सीमा असीम 
 मुस्कुरा कर हर बात को टाल देती हूँ  दिलोदिमाग में तुम्हें बसा लेती हूँ  कहाँ मिलती है जिंदगी में खुशियाँ ही खुशियाँ  यही सोचकर दिन गुजार लेती हूँ  क्या तुम भी कभी याद करते हो  या मैं ही हरवक्त तुम्हारा नाम लेती हूँ....
 माथे से टपकती हुई पसीने को पहुंचकर एक तरफ से रखते हुए अतुल ने नजरे उठाकर समुद्र की तरफ देखा कितना शोर करता है यह समुद्र लेकिन इससे तो कहीं ज्यादा उसके मन में इस समय हाहाकार मचा हुआ है संभलता नहीं है तभी तो किनारे पर जाकर अपना सर पटकता है और फिर वापस लौट जाता है सच में इस मानसिक पीड़ा को सहन बहुत मुश्किल हो रहा है समझ नहीं आ रहा क्या किया जाए कैसे समझाएं मां को इतनी बेचैनी कभी भी नहीं हुई जब ऑफिस में मन नहीं लगता अक्सर इधर ही आकर बैठ जाता हूं लेकिन आज तो करीब 5 घंटे हो गया ऐसे ही बैठे हुए फिर भी मन को और भी बेचैन होता जा रहा है अपनी कलाई घड़ी की तरफ देखा शाम के 7:00 बज रहे हैं लोगों की भीड़ में बढ़ने लगी है तो मां और भी वह तो शांति की तलाश में यहां चला आता है और जब मन शांत हो जाता तब फिर वापस लौट जाता आज की बात ही अलग है लेकिन क्या कर सकता है चलो घर चलते हैं वहां पर सुनीता इंतजार कर रही होगी परेशान हो रही होगी लेकिन उसकी एक ही आदत बहुत अच्छी है कि वह कभी फोन करके डिस्टर्ब नहीं करती अपने और कामों में लग जाती है उसे पता है कि जब अतुल को देर होने लगती है या किसी काम में फंस जाता है तो...

मेरी ऑंखें

 मासूमियत से भरी   मेरी आंखों में   है थोड़ी सी नाराजगी  या यूँ कहें छाई है उदासी  या फिर कोई शिकायत  जो करना चाहती है अपनों से ही   वह चाहती है जीतना खुद से ही   सपनों के आकाश को   जो नहीं है उसकी पहुंच में उसे भी   ताकि मुरझाई मुरझाई सी आंखों में  भर जाये थोड़ी ख़ुशी  जुगनू सी चमकती चमक.. क्यों छाई है इतनी बेबसी  मुश्किल तो नहीं है कुछ भी  क्यों थक कर चूर हो गई है अभी से   भटकना नहीं  तलाशना है   तराशना है और   पूरा कर लेना है हर ख्वाब अपना   हर यकीन को पा लेना है  प्रेम के क्षितिज पर  घरौंदा बनाकर  मुठ्ठी में भर लेना  अपना आसमां ..... सीमा असीम  14,10,24   प्यारी निधि आपके लिए ❤️
 वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार... वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार  चाँदनी रातों में  जब चाँद खिड़की से झाँकता होगा  सुनहरी रौशनी में उसे भिगोता होगा  तब वो लेता होगा मुझे पुकार  बार बार  हर बार... वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार... रात को थककर  जब कभी वो सोता होगा  सुबह उठकर  आँखें भिगोता होगा  कितनी बेचैनी से  तपड़ता होगा  घबराकर होता होगा बेजार  बार बार  हर बार  वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार  सीमा असीम  13,10,24

हिंदी कविता

 कुछ बदला बदला सा लगता है क्या समय बदला है  क्या मौसम बदला है  या मैं बदल गयी हूँ.. तुम्हें याद न करके भी  अब दिन रात याद कर रही हूँ  वो कड़वाहट जो मन में घुली थी  सब मिट गयी है  अब मीठी मीठी सी  मिठास से मैं भर रही हूँ.. क्या तुम मुझे किसी जादुई नशे में  भिगोने को छड़ी घुमा रहे हो  या मैं खुद ही नशे में  चूर हो रही हूँ.. समझ नहीं आता है फिर भी  कोशिश करती हूँ समझने की  या जानबूझकर  मैं और नासमझ हो रही हूँ.. करो कुछ ऐसा ईश्वर कि  हो जाये चमत्कार कोई  यह मैं अपनी आत्मा से  गुजारिश कर रही हूँ.   दिन तो बदलते हैं एकदिन  किसी के भी  मैं तो एक सच्ची इंसान हूँ  फिर क्यों इतना परेशान हो रही हूँ.. तुम जानो अपनी  हो कैसे इंसान तुम  मैं तो अग्नि में तपकर  एकदम खरी हो रही हूँ.. सीमा असीम  12,10,24
 मौसमों का अब मेरे मन पर कोई असर नहीं होता है  मेरा मन तो बस एक मौसम में ही खोया रहता है   सावन के अंधे को दिखती है हरियाली चारो तरफ  प्रेम में डूबा हुआ मेरा मन प्रेम में ही रमा रहता है   बड़े नादा है जो उठा देते हैं उंगली सामने वाले की तरह  समझते ही नहीं है कि उठी है तीन उंगलियां मेरी तरफ  सीमा असीम  24,9,24

प्रेम है मुझे...

 जब होती बार बार बारिश तो  भीगे हुए फूलों को देखते हुए  हरियाली के पास से गुजरते हुए  अक्सर यही तो सोचती हूं मैं  यूं ही नहीं होती है यह बारिश   कहीं तुम मुझे याद करके रोते हो   करते होंगे गुहार आसमा से और  बादलों के संग बरस पढ़ते होंगे   तभी तो मुस्कुरा देता है मेरा भी मन कभी-कभी   रुक जाए बारिश और तुम भी मुस्कुरा दो   पोंछ कर अपनी नम आंखों को ख़ुश हो जाओ  कि जरूरी है इस अहसास को महसूस करना  जीने के लिए अपनी भावनाओं को कहना  नहीं तो घुट जाओगे मन ही मन  कोई नहीं समझेगा तुम्हे  न तुम्हारे जज्बातो को  कहो और कहते रहो  कि प्रेम है मुझे  हाँ प्रेम है मुझे  तुमसे ही सिर्फ  तुमसे ही..... सीमा असीम  18,9,24

जिस तरह तैरती हैं पानी में....

 जिस तरह से तैरती है पानी में मछलियां   ठीक उस तरह से तुम मेरी आंखों में तैरते हो   याद ना करना चाहूं तो भी तुम   हर वक्त मेरी यादों में रहते हो   यूँ कम तो नहीं हैं मेरी भरी भरी आंखें  किसी नदी से   जहां तुम दिन रात अठखेलिया करते हो   आ जाओ कभी तो रूबरू मेरे सपनों के  राजकुमार की तरह घोड़े पर सवार होकर   या कभी चले आओ यूँ ही चहलकदमी करते हुए   और मेरी पलकों पर हाथ रख दो   अगर घबरा जाऊं मैं तो समेट लो मुझे अपनी बाहों में  और मुझे अपने प्रेम से तर बतर कर दो   यह सब ख्याल यूं ही तो नहीं आते मेरे मन में  गूंजती है कोई सदा ब्रह्मांड में   तो जोड़ देती है हमें आपस में   और यू शब्द उतर जाते हैं  कागज पर.... सीमा असीम  17,9,24

जाने क्या क्या करते होंगे

 जब तुम मुझे याद करते होंगे ना जाने क्या-क्या सोचते होंगे या कभी मुस्कुरा देते होंगे या कभी रो देते होंगे   सबसे छुपा कर पोछ लेते होंगे अपनी नम ऑंखें और अपनी मुस्कान को सबके पास बिखेर देते होंगे   न जाने तुम क्या करते होंगे जब तुम मुझे याद करते होंगे  गुजरे लम्हों की एकएक बात को किसी फिल्म की मानिंद देखते होंगे या किसी किताब के पन्ने पलटते हुए पढ़ते होंगे   जब तुम मुझे याद करते होंगे ना जाने क्या क्या करते होंगे   जब होते होंगे अकेले तो आंखों से आंसू किसी बारिश की मानिंद झरते होंगे या सावन की रिमझिम रिमझिम फुहारों से बरसते होंगे   सब कुछ कहने को दीवार से सट कर बैठते होंगे तुम ना जाने दीवारों से कैसे बातें करते होंगे ना जाने क्या क्या करते होंगे  यादों के झुरमुट से गुजरते हुए तुम मुझे शीतल साया सा अनुभूत करते होंगे  न जाने क्या क्या करते होंगे.... सीमा असीम  15,9,24

आशीर्वाद

 कितनी खूबसूरत अच्छी हवा चल रही है  एकदम से मधुर मधुर बयार  मन को शीतलता देती हुई  ऐसा लग रहा है मानो हमें खुशी के पंख लग गये हैं और  हमारा मन उड़ाता चला जा रहा है  एक बात तो है जब हम बहुत खुश होते हैं तो  ईश्वर का आशीर्वाद हमारे साथ होता है लेकिन  ईश्वर का आशीर्वाद भी तभी मिलता है  जब हमारे अच्छे दिन आने वाले होते हैं और  जब हमारे अच्छे दिन आने वाले होते हैं  तो हमारे चेहरे पर अनायास ऐसे ही  मुस्कान चली आती है   बिना किसी वजह के  बिना किसी बात के हम मुस्कुरा देते हैं  और कहते भी है ना  मुस्कान हमारे चेहरे पर ईश्वर का आशीर्वाद होता है 🥰 सीमा असीम  5,6,24
 रतन ने फोन किया बट फोन तो उठा नहीं बस स्विच ऑफ कर बता दिया वह परेशान हुआ और उसने दोबारा से फोन ट्राई किया फिर वही आवाज हरि क्या हुआ उसने अपना सोच ऑफ कर दिया फोन क्यों किया उसने फोन नंबर अपना बंद क्यों कर दिया क्या वह ठीक नहीं है या वह और ज्यादा बीमार हो गई या कुछ और हो गया उसको आने को सवाल जवाब उसके दिलों दिमाग में घूमने लगे उसने सोचा क्या किया जाए उसके पास तो कोई तरीका भी नहीं था जिससे कि वह इशा से बात कर पाए या किसी के द्वारा उसको मैसेज कर पाए यह भी तो संभव नहीं था क्योंकि कोई लिंक भी नहीं रहा था उसे ख्याल आया कि हो सकता है उसे लड़की का नंबर हो उसके पास इसके रूम का एड्रेस उसके मम्मी पापा को दिया था और वह छोड़कर चली गई थी जब शादी की वजह करने के लिए तभी उसने अपना मोबाइल उठाया और सच करना शुरू कर दिया शायद उसका नंबर मिल जाए रत्न उसका नाम नाम शायद निधि था हां निधि नाम था उसका उसने अल्फाबेट में जाकर नंबर शुरू कर दिए लेकिन नंबर ही नहीं मिला निधि निधि नाम से तो कोई नंबर ही नहीं है शायद उसने ईशा की फ्रेंड के नाम से नंबर सेव किया हो हां यह हो सकता है उसे ऐसा डाला उसकी बहुत सारी फ्रेंड्स क...

मौसम

मौसम का रुख हमेशा बदलता रहेगा  आज सर्द तो कल गर्मी होता रहेगा  बस तुम न बदलो कभी गुजारिश है  सुख दुःख तो यूँ आता जाता रहेगा!! सीमा असीम  2,5,24

स्त्री

 दुनिया में होने वाली हर बात से है वो बेखबर  उसे नहीं पता कि आज है मजदूर दिवस  जहां दुनिया में राष्ट्रीय अवकाश मनाया जा रहा है  वहीं पर वह सुबह से लगी है घर के कामों में  वह स्त्री है तो उसका काम है घर की देखभाल करना  घर की साफ सफाई करना  उसमें सुबह उठकर सबसे पहले घर में फूल झाड़ू से सारे घर की धूल झाड़ दी है और चमका दिया कोने-कोने को  बड़े बुजुर्गों की झिडकियां भी सह लेती है  और चुपचाप कोने में जाकर रो लेती है  कि नहीं सिखाया उसे बड़ों को जवाब देना  पलट कर कुछ कहना भी नहीं  उसे बस इतना पता है कि वह हाउसवाइफ है  तो उसे घर के सारे काम करने हैं  साफ सफाई से लेकर  खाना बनाने से लेकर  हर किसी की देखभाल करनी है  हर किसी को उसका उचित मान सम्मान देना है  वो इस बात का भी शुक्र मानती है  कि नहीं है कामकाजी  वरना उसे काम से लौटकर देखना पड़ता  घर गृहस्ती को  चूल्हे चौके को और  बाल बच्चों को भी  बसअब लिपत है घर में ही  खुश है और घर के काम करने में सुखी है  क्योंकि ह...

पतझड़

 पतझड़ तो चला गया है दुम दबाकर  बसंत ने अपना साम्राज्य फैला दिया है  दस्तक दे दी हैआहिस्ता से  गर्मी ने  सूरज की किरणों ने व्याकुल कर दिया  पशु पक्षी के साथ साथ हम इंसान भी  तपती  धूप से बचने को छाया की  ओट तलाशने लगे हैं  मौसम की मार ने सदा गरीबों और  निरीहों को ही अपना शिकार बना लिया  !!! सीमा असीम  ३०,4,२४

मुक्तक

 मुस्कुराते हुऐ हर ग़म को छुपा लेते हैं   चाँद तारों को अपना दर्द बता देते हैं   कर लेते हैं बात बड़ी ख़ामोशी से हम   तुम्हें यूँ ख्वाबों ख़्यालों में सजा लेते हैं!! सीमा असीम  29,4,24

तुम

 तुम भी मुझे यूँ ही सोचते होंगे  ढलती शाम को मचलते होंगे  नहीं पाते होंगे चैन भीड़ में भी  एक झलक पाने को तरसते होंगे  सीमा असीम  27,4,24
 सुरमई शाम में तुम याद बनकर चले आते हो  जब रात होती है तो ख्वाब में चले आते हो  रोशन है मेरा तन मन तुम्हारे प्रेम की खातिर   सुबह आती है तो किरण बनकर चले आते हो   यूं ही सदा आते हो तुम जाते तो हो नहीं कभी   फिर क्यों मैं तुम्हें कहती हूं तुम बिरहा दे जाते हो..
 तुम चाहें किसी भी तरह से मुझे परेशान करो  याद करके या फिर भुलाकर   हर स्थिति में स्थिति में है मैं तो सिर्फ   तुम्हारे ही मन में हूं और तुम्हारी बातों में भी हूं   भले ही उन बातों को तुम कभी किसी से कह नहीं पाते हो सुन नहीं पाते हो   खुद ही खुद मन ही मन दोहराते रहते हो, कहते रहते हो और सुनते भी रहते हो  बस यही तो प्रेम है सीमा असीम 

पिता के हाथ के निशान

 पिता के हाथ के निशान ================   पिता जी बूढ़े हो गए थे और चलते समय दीवार का सहारा लेते थे। नतीजतन, दीवारें जहाँ भी छूती थीं, वहाँ रंग उड़ जाता था और दीवारों पर उनके उंगलियों के निशान पड़ जाते थे।मेरी पत्नी ने यह देखा और अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों के बारे में शिकायत करती थी। एक दिन, उन्हें सिरदर्द हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपने सिर पर थोड़ा तेल मालिश किया। इसलिए चलते समय दीवारों पर तेल के दाग बन गए। मेरी पत्नी यह देखकर मुझ पर चिल्लाई। और मैंने भी अपने पिता पर चिल्लाया और उनसे बदतमीजी से बात की, उन्हें सलाह दी कि वे चलते समय दीवारों को न छुएँ। वे दुखी लग रहे थे। मुझे भी अपने व्यवहार पर शर्म आ रही थी, लेकिन मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। पिता जी ने चलते समय दीवार को पकड़ना बंद कर दिया। और एक दिन गिर पड़े। वे बिस्तर पर पड़ गए और कुछ ही समय में हमें छोड़कर चले गए। मुझे अपने दिल में अपराधबोध महसूस हुआ और मैं उनके भावों को कभी नहीं भूल पाया और कुछ ही समय बाद उनके निधन के लिए खुद को माफ़ नहीं कर पाया। कुछ समय बाद, हम अपने घर की पेंटिंग करवाना चाहते थे।  जब पेंटर आए, तो मेरे...

बारिश

 आज मौसम की पहली बारिश हुई  तेज हवाएं चली और बदल ले आई   कल घने पानी भरे हुए बादल  चले आए लहराते हुए   मचलते इतराते और इठलाते हुए   बरस गए झूम कर   और भिगो गए मेरा मन   तब याद आए तुम   बहुत याद आए   क्या तुम बारिश बन कर चले आए   मुझे भिगोने के लिए  आंगन को गीला करने के लिए  हां तुम ही तो थे जो बारिश बनकर आए   और छूकर बरस कर दुखी मन को सुख में बदल गए  मौसम की बारिश और तुम याद आए  सीमा असीम  24,4,24

सीमा असीम का साक्षात्कार

  सीमा असीम का साक्षात्कार जो अंतराष्ट्रीय पत्रिका अनुस्वार में प्रकाशित हुआ है ...आभार ---------------------------------------------------------------------------------------------------------   1. सीमा जी साहित्य सृजन में आपकी रुचि कैसे उत्पन्न हुई ? किस साहित्यकार से आपको लिखने की प्रेरणा मिली ? उत्तर … अपने भावों और अपने विचारों को सुसम्बद्ध तरीके से लिख देना कोई आसान काम नहीं है , लिखना एक गहन प्रक्रिया है , जो धीरे - धीरे आती है और उसके लिए आपको बहुत लगन के साथ में तपस्या करनी पड़ती है तभी आप अच्छे से लेखन कर सकते हो । मुझे लगता है कि भाव और विचार तो जब बच्चा समझदार हो जाता है तभी उसके मन में आने लगते हैं लेकिन तब वह लिख नहीं पाता । ऐसा ही मेरे साथ भी था । जब मैंने थोड़ा थोड़ा लिखना पढ़ना सीख लिया था तो मैं लिखने लगी थी हालांकि मेरे मन में बहुत सारे विचार उमड़ते घुमड़ते रहते थे , अंतर्मुखी स्वभाव होने की वजह से मैं ज्यादा बोलती तो नहीं थी पर मैं चीजों को लिख देती थी फिर मैंने नंदन चंपक जैसी पत्रिकाओं के लिए छोटे - छोटे से लेख , कविताएं लिखकर भेजती थी। जहां तक साहित्य ...