मैं रात भर जगती रही
मैं तड़पती रही
मैं मचलती रही
रात भर यूँ ही
करवट बदलती रही
नींद आँखों से मेरे
कोसों दूर थी
फ़िक्र तेरी मुझे
लगी ही रही
तू तो सोया होगा
चैन से रात भर
सुंदर ख़्वाबों में तू
खोया होगा
मैं दुआ तुझे
देती रही..
मैं तड़पती रही
मैं मचलती रही रात भर
यूँ ही
करवट बदलती रही
जो हुआ वो थी
रब की मर्जी
अब जो होगा वो भी है
रब की रजा
फिर क्यों सदा दिल् से
आती रही रही
याद तेरी मुझे
क्यों आती रही
क्यों रुलाती रही
जो ख़्वाबों को हमने
सजाया कभी
टूट कर सब चूर हो गये
कांच इतने चुभे
दर्द इतने जगे
मुझे होश में
बेहोशी छाती रही
मैं तड़पती रही
मैं मचलती रही
रात भर करवट बदलती रही....
सीमा असीम
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