हिंदी कविता

 कुछ बदला बदला सा लगता है

क्या समय बदला है 

क्या मौसम बदला है 

या मैं बदल गयी हूँ..

तुम्हें याद न करके भी 

अब दिन रात याद कर रही हूँ 


वो कड़वाहट जो मन में घुली थी 

सब मिट गयी है 

अब मीठी मीठी सी 

मिठास से मैं भर रही हूँ..


क्या तुम मुझे किसी जादुई नशे में 

भिगोने को छड़ी घुमा रहे हो 

या मैं खुद ही नशे में 

चूर हो रही हूँ..


समझ नहीं आता है फिर भी 

कोशिश करती हूँ समझने की 

या जानबूझकर 

मैं और नासमझ हो रही हूँ..


करो कुछ ऐसा ईश्वर कि 

हो जाये चमत्कार कोई 

यह मैं अपनी आत्मा से 

गुजारिश कर रही हूँ.

 

दिन तो बदलते हैं एकदिन 

किसी के भी 

मैं तो एक सच्ची इंसान हूँ 

फिर क्यों इतना परेशान हो रही हूँ..


तुम जानो अपनी 

हो कैसे इंसान तुम 

मैं तो अग्नि में तपकर 

एकदम खरी हो रही हूँ..


सीमा असीम 

12,10,24



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