मौसमों का अब मेरे मन पर कोई असर नहीं होता है
मेरा मन तो बस एक मौसम में ही खोया रहता है
सावन के अंधे को दिखती है हरियाली चारो तरफ
प्रेम में डूबा हुआ मेरा मन प्रेम में ही रमा रहता है
बड़े नादा है जो उठा देते हैं उंगली सामने वाले की तरह
समझते ही नहीं है कि उठी है तीन उंगलियां मेरी तरफ
सीमा असीम
24,9,24
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