सुनो
जब मैं तुम्हें याद करती हूँ
आँखें छलक पड़ती हैं
मैं चाहती हूँ मुसकुराना
पर नहीं मुस्कुरा पाती हूँ
मैं अपनी बाहें फैला कर
तुम्हें अपनी बाहों में भरने को
उतावली हो उठती हूँ अगर
कि तड़प उठता है दिल
रो पड़ता है दिल
क्यों सनम
क्या खता हुई है मुझसे
सिर्फ प्रेम ही तो किया
अगर प्रेम गुनाह है तो
किया है मैंने गुनाह
मानती हूँ अपने गुनाह को
लेकिन सुनो प्रिय
तुम भी बराबर के हकदार हो
मैं अकेली गुनहगार नहीं हूँ
तो सजा सिर्फ मुझे ही क्यों
दर्द आँसू , तड़प , बेचैनी सिर्फ मेरे लिए ही क्यों
शायद तुम भी बराबर के भागीदार हो
हाँ हो न
तुम भी तो पा रहे हो यही सजा
जो मुझे मुकरर्र कर दी गयी है
सीमा असीम
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