कहना तो बहुत कुछ है तुमसे 
पर कैसे कहें तुम ही कहो ॥
सुनो प्रिय 
       शायद तुम सब जानते हो समझते हो लेकिन मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं है न तुम्हारे पास तभी तुम खामोश हो जाते हो ,,पर सुनो खामोश रहना किसी भी बात का इलाज नहीं है और न ही सही तरीका है क्योंकि जब तुम मेरे हो सिर्फ मेरे तो फिर तुम किसी और के कैसे हो सकते हो और किसी और को गले कैसे लगा सकते हो ? बोलो बताओ ? क्या यही होता है विश्वास और आस्था का परिणाम कि तुम एक झटके में उस को तोड़ दो और खुद को सही साबित करने के लिए लगातार तोड़ते ही चले जाओ ,,इतने टुकड़े करो कि हर टुकड़े से तुम्हारा अक्स दिखने लगे ,,, सच में आज इंसान के अंदर इंसानियत बची ही नहीं है न उसके अंदर कोई भावना ,,,वो जीते जी भी मारे हुए के समान हो गया है ,,, तभी तो तुम मुझे दुख देते रहे एक शख्स जिसने तुम पर अपना तन मन और धन लूटा दिया उसे सिर्फ लूटते ही रहे कभी यह ख्याल भी नहीं आया तुम्हारे मन में कि यह भी एक इंसान है लेकिन नहीं तुम्हें तो उसे जीतना था और उसे जीतने की खातिर गिरते गए और इतना गिरे हो कि तुम खुद से भी नजर नहीं मिला पाते होगे ,,,हैं न ? 
या तुम्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता होगा क्योंकि यही आदतें रही होंगी तुम्हारी ,,,चलो अच्छा है ,,,अब एक दिन आयेगा जब तुम फिर से मेरे हो जाओगे देखना तुम सिर्फ मेरे हो जाओगे ,,,,
तुम्हारा मन और तुम्हारा दिल तुम्हें उतना ही सताएगा जैसे मुझे सताया था ,,,,,कुछ नहीं कहना मुझे तुमसे ,,और कहने से होगा भी क्या 
खुद ही समझो तो बेहतर होता है ....
सीमा असीम 
29,4,20 

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