क्या कहिए उस बेअदब को जिसे परवाह नहीं किसी अपने की ,,,जब बहते हैं मेरे आँसू तब रो पड़ती है यह सारी कायनात पशु पक्षी सब विचलित हो जाते हैं बादल आकर बरसते हैं और इन्द्र कुपित होकर ओले गिराते हैं दहल जाता है धरती का सीना आसमां भी कुपित हो जाता है मेरी सच्चाई का मज़ाक बनाने वाले ओ मूर्ख इंसान तू खुद ही अपने आप को गिरा लेता है खुद की ही नजर में कोई फायदा नहीं होगा तेरा मुझे यूं दुख दर्द के सागर में गिराकर तू छेंड देता है मेरी वही दुखती रग जो तू सालों से घायल कर रहा है जरा संभलता है दर्द कि तू फिर से दुखा देता है तुझे अभी चेत नहीं हुआ क्या तू अभी भी नहीं समझा क्या अभी भी शर्म से पानी पानी नहीं हुआ क्या अभी भी तू अपनी ही नजरों में नहीं गिरा ओ मूर्ख मानव तुझे अपनी करनी की सजा अकेले नहीं भुगतनी पड़ रही बल्कि पूरा संसार भुगत रहा है मूर्ख सुधार जा अभी भी वक्त है मुझे इस तरह मत रुला मत कर घायल अपने तीरों से मत कर इतना बेचैन कि तड़प तड़प जाये मन और न रुकें बहते हुए आँसू ये मेरे आँसू नहीं बहते मेरा प्रेम बहता है मेरा दर्द बहता है मेरे जख्मों पर इतना नमक मत डाल कि लूट लिया मुझे बर्बाद कर दिया मिटा दिया सब खतम कर दिया अभी भी चैन नहीं आया तुझे ओ मूर्ख इंसान सभल जरा और मुझे सकूँ लेने दे ...सीमा असीम 7, 4,20
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