मुझे अब कुछ और दीवाना कर दे कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं सच कहूँ तो दिल इतना उदास और परेशान है कि समझ ही नहीं आता है क्या करू ? क्या लिखूँ और क्या कहूँ ? मैं सब भूल गयी सच झूठ से परे हो गयी ,,, नहीं याद मुझे कि मैं तुम्हें जानती भी हूँ , पहचानती भी हूँ कि तुम वो नहीं हो जो तुम थे अब कोई और है कोई अलग सा व्यक्ति ,,, तुम एक इंसान ही रहते वो भी सही था लेकिन तुम इंसान नहीं बल्कि एक व्यक्ति बन गए कोई आम व्यक्ति ,,, जिसे मैं जानती थी , पहचानती और समझती थी वो कहीं मिट गया है ,,, असाधारण, अपरिमित, अनोखा और जादुई व्यक्तित्व वाला वो इंसान ...जिसे मेरे प्रेम ने हीरे की तरह चमका दिया था ,,, क्योंकि तराशा इतना कि हर कोना जगमगा उठा था ,,, फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि उसकी चमक धूमिल सी होने लगी धुंधलाने लगा अक्स ,,, मानों किसी ने उस पर मिट्टी उड़ेल दी हो किसी ने उसकी चमक को चुरा लिया हो ।,,,अचंभित हूँ सच में बहुत ही दुखी और तकलीफ में भी कि आखिर ऐसा क्यों कर हुआ ,,,,सनम तुझे याद कर कर के रोये बहुत हैं कि दम घुटने लगा है तुझे सोचती हूँ तो ...सीमा असीम 27,4,20
मुस्कुराना
कितना अच्छा लगता है सुबह सुबह सूरज का निकलना पंछियों का चहकना फूलों का खिलना और रोशनी का बिखर जाना रात के अंधेरे को मिटाते हुए जब रोशनी होती है तो मन खुशी से प्रफुल्लित होता है बहुत अच्छा लगता है मुझे दुनिया को रोशनी में देखना मुझे नहीं पसंद अंधेरा नहीं पसंद मुझे मुरझाना नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा मुस्कुराना तुम्हारा मुझ से बतियाना....... सीमा असीम 3, 10, 20
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