लिखती हूँ तेरा नाम उसे और गहरा कर उकेरती जाती हूँ अपने दिल से आत्मा तक ले जाती हूँ तुम करते रहना दिमाग की बातें प्रेम को परे कर के मैं तो अपने दिल को और भी सच्चा करके रिश्ता निभाये जाती हूँ क्यों दूँ मैं तुम्हें कोई दोष हो सकता है यही तुम्हारे संस्कार हो गलत करना और उसे ही सही कहना लेकिन मैं सही को कभी गलत क्यों कहूँ मैं जो है सच उसे ही क्यों न सच कहूँ मैं अपने संस्कार अब कभी नहीं छोड़ूँगी बहुत हुआ अब मैं सिर्फ अपने मन की ही करूंगी अपने मन की सुनुंगी क्यों कहूँ मैं तुम्हारे मन की बातें तुम ही कहो न जो चाहे मन तुम्हारा करो करते रहो एक दिन हार थक कर बैठ जाओगे फिर देखना कितना पछताओगे रोओगे सिर पकड़ कर अपना एक बेगुनाह को जो इतना सताओगे मैं कहाँ कहती हूँ तुम्हें कभी कुछ ओ मेरे सनम मेरे दिल की आहें और आँखों की नमी जो खुद ही आ जाती हैं उनका कोई इलाज है तुम्हारे पास बोलो बोलो न ...सीमा असीम 13,4, 20 

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